Sunday, September 12, 2010

गणपति बप्पा : ईश्वर कहीं नहीं, सिवा इन्सानी दिमाग के


          दुनिया के सबसे अनोखे देव इस समय भारतवर्ष के कुछ गली कूचों में आ बिराजे हैं, भक्त समाज अपने दिमाग की खिड़कियाँ बंदकर उनकी भक्ति में लीन हो गया है। आठ दस दिन बाद इन्हें नदी तालाबों में विसर्जित कर प्रदूषण बढ़ाया जाएगा।
          भारतीयों की उदारता का कोई जवाब नहीं है। वे प्रत्येक असंभव बात पर आँख बंदकर विश्वास कर लेते हैं यदि उसमें ईश्वर की महिमा मौजूद हो। पार्वती जी ने अपने शरीर के मैल से एक पुतला बनाया और नहाने की क्रिया के दौरान कोई ताकाझांकी ना करे इसलिए उस पुतले में प्राण फूँक कर उसे पहरे पर बिठा दिया। ऐसा कितना मैल पार्वती जी के शरीर से निकला होगा इस प्रश्न पर ना जाकर यह सोचा जाए कि पुतले में कैसे कोई प्राण फूँक सकता है, लेकिन चूँकि वे भगवान शिव की पत्नी थीं सो उनके लिए सब संभव था। दूसरा प्रश्न, भगवान की पत्नी को भी ताकाझांकी का डर ! बात कुछ पचती नहीं। किसकी हिम्मत थी जो इतने क्रोधी भगवान की पत्नी की ओर नहाते हुए ताकझांक करता !
          खैर, ज़ाहिर है कि चूँकि पुतला तत्काल ही बनाया गया था सो वह शिवजी को कैसे पहचानता ! पिता होने का कोई भी फर्ज़ उन्होंने उस वक्त तक तो निभाया नहीं था ! माता के आज्ञाकारी पुतले ने शिवजी को घर के अन्दर घुसने नहीं दिया तो शिवजी ने गुस्से में उसकी गरदन उड़ा दी। उस वक्त कानून का कोई डर जो नहीं था। पार्वती जी को पता चला तो उन्होंने बड़ा हंगामा मचाया और ज़िद पकड़ ली की अभी तत्काल पुतले को ज़िदा किया जाए, वह मेरा पुत्र है। शिवजी को पार्वती जी की ज़िद के आगे झुकना पड़ा परन्तु भगवान होने के बावजूद भी वे गुड्डे का सिर वापस जोड़ने में सक्षम नहीं थे। सर्जरी जो नहीं आती थी। परन्तु शरीर विज्ञान के नियमों को शिथिल कर अति प्राकृतिक कारनामा करने में उन्हें कोई अड़चन नहीं थी, आखिर वे भगवान थे। उन्होंने हाल ही में जनी एक हथिनी के बच्चे का सिर काटकर उस पुतले के धड़ से जोड़ दिया। ना ब्लड ग्रुप देखने की जरूरत पड़ी ना ही रक्त शिराओं, नाड़ी तंत्र की भिन्नता आड़े आई। यहाँ तक कि गरदन का साइज़ भी समस्या नहीं बना। पृथ्वी पर प्रथम देवता गजानन का अविर्भाव हो गया।
          प्रथम देवता की उपाधि की भी एक कहानी बुज़र्गों के मुँह से सुनी है। देवताओं में रेस हुई। जो सबसे पहले पृथ्वी के तीन चक्कर लगाकर वापस आएगा उसे प्रथम देवता का खिताब दिया जाएगा। उस वक्त पृथ्वी का आकार यदि देवताओं को पता होता तो वे ऐसी मूर्खता कभी नहीं करते। गणेशजी ने सबको बेवकूफ बनाते हुए पार्वती जी के तीन चक्कर लगा दिए और देवताओं को यह मानना पड़ा कि माँ भी पृथ्वी तुल्य होती है। गणेश जी को उस दिन से प्रथम देवता माना जाने लगा। बुद्धि का देवता भी उन्हें शायद तभी से कहा जाने जाता है, उन्होंने चतुराई से सारे देवताओं को बेवकूफ जो बनाया। आज अगर ओलम्पिक में अपनी मम्मी के तीन चक्कर काटकर कोई कहें कि हमने मेराथन जीत ली तो रेफरी उस धावक को हमेशा के लिए दौड़ने से वंचित कर देगा।  आज का समय होता तो मार अदालतबाजी चलती, वकील लोग गणेश जी के जन्म की पूरी कहानी को अदालत में चेलेन्ज करके माँ-बेटे के रिश्ते को ही संदिग्ध घोषित करवा देते।
          बहरहाल, इस बार भारत में गणेशजी ऐसे समय में बिराजे हैं जबकि दुनिया में ईश्वर है या नहीं बहस तेज हो गई है। इस ब्रम्हांड को ईश्वर ने बनाया है कि नहीं इस पर एक वैज्ञानिक ने संशय जताया जा रहा है जिसे पूँजीवादी प्रेस प्रचारित कर रहा है। जो सत्य विज्ञान पहले से ही जानता है और जिसे जानबूझकर मानव समाज से छुपाकर रखा गया है, उसे इस नए रूप में प्रस्तुत करने के पीछे क्या स्वार्थ हो सकता है सोचने की बात यह है। क्या विज्ञान की सभी शाखाओं को समन्वित कर प्रकृति विश्व ब्रम्हांड एवं मानव समाज के सत्यों को पहले कभी उद्घाटित नहीं किया गया ? किया गया है, परन्तु यह काम मार्क्सवाद ने किया है, इसीलिए वह समस्त विज्ञानों का विज्ञान है, परन्तु चूँकि वह शोषण से मुक्ति का भी विज्ञान है, इसलिए उसे आम जनता से दूर रखा जाता है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद-ऐतिहासिक भौतिकवाद को लोगों से छुपाकर रखा जाता है, जबकि अगर कोई सचमुच सत्य को खोजना चाहता है तो इस सर्वोन्नत विज्ञान को जानना बहुत ज़रूरी है।
          लोग ईश्वर की खोज के पीछे पड़े हैं। हम कहते हैं कि ईश्वर की समस्त धारणाएँ धर्म आधारित हैं, तो पहले यह खोज कीजिए कि धर्म कहाँ से आया, कैसे आया। धार्मिक मूल्य अब इस जम़ाने में मौजू है या नहीं। मध्ययुगीन धार्मिक मूल्यों के सामने आधुनिक मूल्यों का दमन क्यों किया जाता है। यदि आप यह समझ गए कि अब आपको मध्ययूगीन धार्मिक मूल्यों की जगह नए आधुनिक मूल्यों की आवश्यकता है जो वैज्ञानिक सत्यों पर आधारित हों, तो ईश्वर की आपको कोई ज़रूरत नहीं पडे़गी।
          एक मोटी सी बात लोगों के दिमाग में जिस दिन आ जाएगी कि ईश्वर ने मनुष्य को नहीं बनाया बल्कि मनुष्य ने ईश्वर को बनाया है, सारे अनसुलझे प्रश्न सुलझ जाऐंगे। क्योंकि पदार्थ (मस्तिष्क) इस सृष्टी में पहले आया, विचार बाद में। ईश्वर मात्र एक विचार है, उसका वस्तुगत अस्तित्व कहीं, किसी रूप में नहीं है, सिवा इन्सान के दिमाग के। 


Saturday, September 4, 2010

शिक्षक दिवस : क्या शिक्षा के ज़रिए अज्ञान का अंधकार दूर ना कर पाने का भयानक अपराध ‘शिक्षकों’ के मथ्थे नहीं मढ़ा जाना चाहिए

    आज शिक्षक दिवस है। सारे अखबार या तो शिक्षकों की बदहाली अथवा प्रशंसा से भरे हुए हैं। अच्छी बात है, जो शिक्षक हमें एक सफल सामाजिक प्राणी बनाने के लिए अपनी रचनात्मक भूमिका निभाकर एक महान कार्य करता है, उसके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रदर्शित करना एक सुशिक्षित व्यक्ति के लिए लाज़मी है और दूसरी और इस महती सामाजिक कार्य की जिम्मेदारी उठाने वाली महत्वपूर्ण इकाई के प्रति सरकार के असंवेदनशील रुख की भर्त्सना करना भी उतना ही ज़रूरी है।
    सरकार का शिक्षकों को दोयम दर्ज़े के सरकारी कर्मचारी की तरह ट्रीट करना, उनके वेतन, भत्तों, सुख-सुविधाओं के प्रति दुर्लक्ष्य करना, उन्हें जनगणना, पल्स पोलियों, चुनाव आदि-आदि कार्यों में उलझाकर शिक्षा के महत्वपूर्ण कार्य से विमुख करना, इनके अलावा और भी कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो एक शिक्षक की भूमिका और महत्व को सिरे से खारिज करते से लगते हैं। लेकिन, इस सबसे परे, शिक्षकों की अपनी कमज़ोरियों, अज्ञान, कुज्ञान, अवैज्ञानिक चिंतन पद्धति, भ्रामक एवं असत्य धारणाओं के वाहक के रूप में समाज में सक्रिय गतिशीलता के कारण आम तौर पर मानव समाज का और खास तौर पर भारतीय समाज का कितना नुकसान हो रहा है, यह हमारे लिए बड़ी चिंता का विषय है।
    पिछले दो-तीन सौ साल मानव सभ्यता के करोड़ों वर्षों के इतिहास में, विज्ञान के विकास की स्वर्णिम समयावधि रही है। इस अवधि में प्रकृति, विश्व ब्रम्हांड एवं मानव समाज के अधिकांश रहस्यों पर से पर्दा उठाकर सभ्यता ने व्यापक क्रांतिकारी करवटें ली हैं। एक अतिप्राकृतिक सत्ता की अनुपस्थिति का दर्शन भी इसी युग में आविर्भूत हुआ है जिसकी परिणति दुनिया भर में मध्ययुगीन सामंती समाज के खात्में के रूप में हुई थी जिसका अस्तित्व ही ईश्वरीय सत्ता की अवास्तविक अवधारणा पर टिका हुआ था।
    भारतीय समाज में सामंती समाज की अवधारणाओं, मूल्यों का पूरी तौर पर पतन आज तक नहीं हो सका है और ना ही वैज्ञानिक अवधारणाओं की समझदारी, आधुनिक चिंतन, विचारधारा का व्यापक प्रसार ही हो सका है। बड़े आश्चर्य की बात है कि जिस समाज में ’सत्य-सत्य‘ का डोंड सामंती समय से ही पीटा जाता रहा हो उस समाज में ’सत्य‘ सबसे ज़्यादा उपेक्षित रहा है।
    हमें आज़ाद हुए 62 वर्ष से ज़्यादा हो गए, देश आज भी सामंत युगीय अज्ञान एवं कूपमंडूकता की गहरी खाई में पड़ा हुआ है। धर्म एवं भारतीय संस्कृति के नाम अवैज्ञानिक क्रियाकलापों कर्मकांडों का ज़बरदस्त बोलबाला हमारे देश में देखा जा सकता है। क्या शिक्षक का यह कर्त्तव्य नहीं था कि वह ’सत्यानुसंधान‘ के अत्यावश्यक रास्ते पर चलते हुए भारतीय समाज को इस अंधे कुएँ से बाहर निकालें ? क्या ’धर्म‘ की सत्ता को सिरे से ध्वस्त कर स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे की संस्कृति को रोपने, वैज्ञानिक चिंतन पद्धति के आधार पर भारतीय समाज का पुनर्गठन करने की जिम्मेदारी ’शिक्षकों‘ की नहीं थी ? क्या शिक्षा के ज़रिए अज्ञान का अंधकार दूर ना कर पाने का भयानक अपराध ’शिक्षकों‘ के मथ्थे नहीं मढ़ा जाना चाहिए जिसने हमारे देश को सदियों पीछे रख छोड़ा है ? क्या मध्ययुगीन अवधारणाओं के दम पर विश्व गुरू होने का फालतू दंभ चूर चूर कर, वास्तव में ज्ञान की वह ’सरिता‘ प्रवाहित करना एक अत्यावश्यक ऐतिहासिक कार्य नहीं था जिसके ना हो सकने का अपराध किसी और के सिर पर नहीं प्रथमतः शिक्षकों के ही सिर पर है।
    अब भी समय है, प्रकृति मानव समाज एवं विश्व ब्रम्हांड के सत्य को गहराई में जाकर समझने और एकीकृत ज्ञान के आधार पर भारतीय समाज में व्याप्त अंधकार को दूर करने की लिए प्रत्येक शिक्षक आज भी अपनी भूमिका का निर्वाह कर सकता है, बशर्ते वह अपने तईं ना केवल ईमानदार हो बल्कि सत्य के लिए प्राण तक तजने को तैयार हो।

Wednesday, August 4, 2010

होगे तुम भगवान...

मैं तुम्हें नहीं मानता
जाओ कर लो
जो बन पड़े
होगे तुम सर्वशक्तिमान

तुम्हारी मूर्तियां
मुझे कला के तौर पर
तो लुभाती हैं
पर लगवा नहीं पाई
कभी पूजा पाठ में ध्यान

तुम्हारे आस्थावान
भक्तों की
क्रूर यातनाएं बताती हैं मुझे
कि तुम वाकई हो
कितने महान

तुम दिखाई नहीं देते है
ये जो प्रश्नचिह्न है
अस्तित्व पर
तुम्हारे उपासकों के लिए है
सर्वोपरि प्रमाण

जितना दबाव डालते हैं
तुम्हारे पूजक मुझ पर
मेरी आस्था
मेरे तुमको न मानने में
होती रही उतनी बलवान

मैं नहीं मानता
तुमको कि हो तुम
कहीं भी
जाओ तुम
होगे खुद के भगवान....

Tuesday, July 27, 2010

OSHO: God Is Not a Solution - but a Problem



** भगवान का शुक्र है कि वह नहीं है ! **
एक तो ये सज्जन विवादास्पद हैं। तिसपर यूट्यूब वालों का कुछ पता नहीं कब वीडियो हटाकर बोल दें कि भैय्या, वहीं आकर देख लो ! इसलिए चिंतन-मनन, बहस-मुबाहिसा जो करना हो, कर डालिए।
इतनी सार्थक  बहस शायद नास्तिक ही कर सकते हैं.

Thursday, July 8, 2010

माधवाचार्य और लोकायत दर्शन

भारतीय दर्शन के इतिहास में भौतिकवाद और आदर्शवाद की दो परस्पर विरोधी धाराएँ एक साथ चलीं हैं दार्शनिक एक के बाद एक आते गए , लेकिन उन्होंने किसी नए मत का प्रतिपादन करके सिर्फ किसी प्राचीन दार्शनिक संप्रदाय से सहमति जताते हुए उसे बल प्रदान किया। उन्होंने स्वयं किसी नए संप्रदाय की नीव रखकर ऐसा लिखा की यह पहले से वर्णित है और यहाँ सिर्फ इसका विस्तार अथवा खुलासा किया जा रहा है अर्थात मेरा कोई स्वतंत्र अस्तित्व है, ऐसा दावा किसी भी दार्शनिक द्वारा नही किया गया। उन्होंने अपने मत के संरक्षण के लिए उसे पोषित किया और विरोधी मत की आलोचना की. आज के कई आधुनिक विद्वान प्राचीन भारतीय भौतिकवाद के विवरण के लिए माधवाचार्य के सर्वदर्शन संग्रह पर आश्रित है. हम इस आलेख में यह जानने का प्रयास करेंगे की क्या इस ग्रन्थ को आधार बनाकर हमें किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए?.

माधवाचार्य या माधव विद्यारण्य, विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक राजाओं के संरक्षक एवं दार्शनिक थे। उन्होने सर्वदर्शनसंग्रह की रचना की जो हिन्दुओं के दार्शनिक सम्प्रदायों के दर्शनों का संग्रह है। इसके अलावा उन्होने अद्वैत
दर्शन के 'पंचदशी' नामक ग्रन्थ की रचना भी की। उनका जन्म सन् १२६८ में पम्पाक्षेत्र (वर्तमान हम्पी) में मायणाचार्य एवं श्रीमतीदेवी के यहाँ हुआ था। माधवाचार्य विद्यारण्य ने लोकायत को सबसे निम्न कोटि का दर्शन बताया है और अद्वैत वेदान्त को सबसे उत्कृष्ट। हमारे प्राचीन दार्शनिकों ने लोकदर्शन और भौतिकवादी दर्शन जिसे लोकायत कहा जाता है, के लिए जिस शब्द का प्रयोग किया वह है "चावार्क" या "बर्हस्पत्य" दर्शन। दार्शनिक माध्वाचार्य विद्यारण्य द्वारा लिखित भारतीय दर्शन के सारग्रन्थ सर्वदर्शन सग्रंह मे लिखे लोकायत के विवरण पर एक नजर डालने पर भौतिकवादियों के प्रति उनकी घृणा का हम स्पष्ट अवलोकन कर सकते हैं।

भौतिकवाद के विरोधियों ने जिन युक्तिओं से संदेहवादी और भौतिकवादी दर्शनों को भाववाद में प्रक्षिप्त करने का काम किया है, उनमें से एक यह भी है कि उसके सत्यापन के लिए वे यह तर्क देते हैं कि सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्य का साक्षात्कार शनै: - शनै: ही करना उचित होता है इसलिए कई भाववादियों ने अपने ग्रंथों में दर्शन का विवरण भौतिकवाद के सिद्धांत से प्रारंभ करके अंततः तथाकथित "सर्वोंच्च आध्यात्मिक सत्य" तक पहुँचाने का मार्ग अपनाया है यह एक चतुराई पूर्ण युक्ति है, जिससे की प्रतिपक्षी का तिरिस्कार करके उन्हें उपहास का पात्र बनाया जा सके। इसके पीछे यह तर्क भी दिया जाता है कि जिस दार्शनिक संप्रदाय का प्रतिनिधित्व लेखक कर रहा है उसे छोड़कर शेष दार्शनिक मान्यताएं एक श्रृंखला के रूप में हैं, जिनमे पहली कड़ी से अधिक उच्च कोटि की अध्यात्मिक व्याख्या दूसरी कड़ी में उपस्थित है इसी प्रकार क्रमशः जो दर्शन अंत में है, वह सर्वोच्च है, शेष सब उस तक पहुचने के मार्ग भर है। माधवाचार्य के सर्वदर्शन संग्रह में भी यही युक्ति देखने को मिलती है उन्होंने वेदान्त को सबसे अंतिम
में रखा है। कई आधुनिक विद्वान लोकायत मत के विवरण के लिए माधवाचार्य पर आश्रित रहे हैं। माधवाचार्य की लोकायत के प्रति मंसूबों में ईमानदारी है, इस तथ्य को मिथ्या साबित करने के लिए हमारे पास कई प्रमाण हैं।

माधवाचार्य और लोकायत मत के मूल काल में करीब दो हजार वर्षों का अंतर है। प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथो कूटदंत सुत्त और ब्रह्मजाल सुत्त जैसे ग्रंथों में लोकायत मत का विवरण है, जिसमे शरीर और आत्मा को एक ही माना गया है, और इस मत का चलन बुद्ध के काल के पूर्व भी था। दूसरा जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है, माधवाचार्य विजय नगर के संस्थापकों के संरक्षक थे यह समझा जाता है कि साम्राज्य स्थापित करने के लिए उन्होंने मध्य युग के एक मठ से धन प्राप्त किया था अतः उनकी सहानूभूति का रुख शासक वर्ग के दर्शन अथवा वेदान्त के प्रति होना स्वाभाविक सा प्रतीत होता है।

माधवाचार्य ने अपने विरोधियों के प्रति जिस तर्क शैली का परिचय दिया है, वह विचित्र है वे खुद को अपने विरोधियों का समर्थक बताते हुए उनकी तरफ से तर्क प्रस्तुत करते थे जबकि स्वयं उनके विचार भिन्न थे। इस प्रकार की शैली के कारण ही माधवाचार्य ने यह उल्लेख नहीं किया कि लोकायत मतानुयायी क्या तर्क प्रस्तुत करते हैं वे इस बात में उलझे रहे की अगर वे लोकायतिक होते तो क्या कहते। उन्होंने वेदांती तर्क शैली को लोकयातिकों पर थोपा और अपने इच्छानुसार निष्कर्ष निकाल लाये। उदहारण के लिए एक प्रसंग का उल्लेख करना उचित होगा - स्वयं माधवाचार्य ने यह स्वीकार किया है किलोकयातिओं ने "श्रुति" को पाखंडियों की कपट रचना बताया है। आगे वे फिर कहते हैं की लोकयातिओं ने अपने विचारों के समर्थन के लिए उपनिषद का उद्धरण दिया। यह दोनों बातें परस्पर विरोधाभास लिए हुए हैं। यह नितांत ही कल्पनामूलक बात है कि किसी मत का विरोध करने वाला उस मत
में प्रयुक्त युक्तिओं का सहारा अपने कार्य के लिए लेगा।

माधवाचार्य के आभामंडल से परे जाकर जब हम अन्य ग्रंथों वर्णित लोकायत मत पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तो कई बातें सामने आती है। उदाहरण के लिए शुक्रनीति सार में स्पस्ट लिखा है की नास्तिकों (लोकयातिओं ) के तर्क बहुत प्रबल हुआ करते थे और उनका रचनात्मक पक्ष भी था। नास्तिकों की मान्यता "सर्व स्वाभाविक मत " अर्थात ऐसा सिद्धांत जिसके अनुसार सब कुछ प्राकृतिक नियमों के अधीन है, एक प्रकार की रचनात्मकता लिए हुए है कि जैसा विवरण माधवाचार्य ने दिया है, वैसा विध्वंसकारी। इसके अलावा कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में सांख्य और योग के साथ लोकायत का उल्लेख किया और इसे तर्क का विज्ञान अथवा आन्वीक्षिकी कहा। मिलिंद में कहानी के नायक नागसेन को लोकायत का ज्ञान प्राप्त है। हर्षचरित (कवेल और थामस द्वारा अनुदित) में जिसमे उपनिषद के अनुयायियों और लोकयातिओं को एक साथ संबोधित किया गया है। लोकयातियों को जिन विद्वानों के समकक्ष रखा गया है, उनमे उपनिषद के अनुयायिओं का होना यह प्रमाणित करता है कि विद्वजनो के मध्य लोकायत मत को वेदान्त दर्शन की तरह ही प्रतिष्ठा प्राप्त थी। इसी प्रकार एक अन्य पुस्तक विनय पिटक के चुल्लवग्ग में एक दृष्टान्त है, जिसमे किसी महात्मा द्वारा भिक्षुओं को लोकायत प्रणाली का अध्ययन करने से रोकने के लिए निर्देश दिए जा रहे
हैं यहाँ एक तथ्य ध्यातव्य है कि उन्होंने निम्न कोटि की अन्य विद्याओं के साथ बलि देने को भी रखा है। जो यह प्रमाणित करता है कि उपनिषद के अनुयायिओं को लोकयातिओं के समकक्ष रखा जाता था। यह माधवाचार्य द्वारा वर्णित विध्वंसकारी वितंडावादिओं के चित्र से तो कदापि मेल नही खाता।

उपरोक्त कई कारणों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि माधवाचार्य द्वारा वर्णित लोकायत का विवरण प्रमाणिक नही है। माधवाचार्य लोकयातिओं को विध्वंसकारी बता रहे थे, वह तो कपोल कल्पित था ही, असल में उनका दृष्टिकोण स्वयं ही तर्क विज्ञान के प्रति विध्वंसकारी था। वे राजनितिक कारणों से ईश्वर, परलोक आदि की
मान्यता को स्थापित करने के लिए बाध्य थे और उन्होंने यह बेहतर तरीके से किया भी है। हम थोडा ध्यान दें तो जान सकते हैं कि उस काल में जब शासक वर्ग को जनता को नियत्रण में रखने के उद्धेश्य से पौराणिक कथाओं और अन्धविश्वास का सृजन करना पड़ रहा था, माधवाचार्य इन सब से कैसे अछूते रहते, वह भी एक राज्य के राजा के
संरक्षक के रूप में यहाँ गौर तलब हो की लगभग सभी धर्मों में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि बताया गया है और उससे विद्रोह को पाप। प्राचीन भौतिकवाद के समृद्ध इतिहास को जानने का प्रयत्न किसी वेदांत दार्शनिक के ग्रन्थ के आधार पर करते वक्त, किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले इन दो विचारधाराओं के मध्य हुए संघर्ष का स्मरण रखना चाहिए।

Tuesday, June 1, 2010

मैं नास्तिक हूं....

मुझे अपनी समझ से
दुनिया को समझने में
अपने हिसाब से
अपने रास्ते पर
चलने में
अपने लिए
अपने खयाल बुनने में
अपने विचारों को
अपनी ज़ुबान में
कहने में
अपनी मस्ती में
बहने
अपनी धुन में
रहने में
नहीं कोई दुविधा है....

मुझे सवाल पूछने
जवाब मांगने
तर्क करने
उंगली उठाने
सोचने समझने
गुत्थियां सुलझाने
अपने मानक
खुद तय करने
दोजख-नर्क के
भय के बिना
जीने और मरने
आवाज़ उठाने
और
तुम्हें मानने
या नकारने में
सुविधा है....

मेरे लिए
ज़ोर से हंस पड़ना
हर अतार्किक बात पर
व्यंग्य करना
तुम्हारे तथाकथित
अनदेखे
अप्रमाणित ईश्वरों पर
न जाना, न जताना
भरोसा
इन इबादत घरों पर
परमकृपालु ईश्वर
हमेशा मेहरबान खुदा
के नाम पर
तुम्हारे द्वारा
किए गए
अपमानों
दी गई गालियों
और हमलों का जवाब
मुस्कुराहट
से देना भी
एक कला है
विधा है.....

और हां
सच है तुम्हारा ये आरोप
ईश्वर के (न) होने
जितना ही
कि मैं
एक नास्तिक हूं.....

mailmayanksaxena@gmail.com