Sunday, March 23, 2014

भगत सिंह, नास्तिकता और साम्यवाद.


व्यक्तित्व मूल्यांकन करने के कौन से औजार होने चाहिए , आने वाला समय इतिहास को किस दृष्टी से देखता है , व्यक्ति विशेष की सक्रियतों के मूल्यांकन के लिए कौन सी पद्धति अपनाई जानी चाहिए?  यह आज के समय का, और कदाचित बीते हुए भूत की व्याख्या के लिए भी एक महत्वपूर्ण सवाल है। यह प्रश्न सिर्फ इसलिए ही आवश्यक नही की यह हमें वस्तुगतता की अनवरत यात्रा पर ले जाता है , यह अतीत और समकालीन परिस्थितिओं के मूल्यांकन का सही तरीका सिखाता है वरन यह इसलिए भी आवश्यक है की यह समकालीन और भावी प्रतिभाओं को सही और गलत के मध्य, सार्थक और निरर्थक क्रियाकलापों के मध्य अंतर बताता है , बदलाओं की ज़मीं तैयार करता है, व्यक्तिगत चेष्टाओं को समाज से जोड़ता है व्यष्टि से समिष्टि तक विचारों के संक्रमण की दिशा तय करता है और उसके परिणाम भी निर्धारित करता है.इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है की व्यक्ति विशेष की सक्रियताओं/चेष्टाओं को एक सुरचित पैमाने में वस्तुगत दृष्टिकोण के साथ मूल्यांकित किया जाये.

यह पद्धति कई चीजों को ध्यान में रखकर क्रियान्वित की जाती है . समकालीन समाज के राजनैतिक, सामाजिक,राज्याश्रित /संवैधानिक नियम (कानूनी ) ,आर्थिक और धार्मिक वातावरण का तत्कालीन समाज पर प्रभाव, व्यक्ति विशेष द्वारा की गई हस्तक्षेप की प्रणाली से इस वातावरण का सम्बन्ध एवं इस हस्तक्षेप से वातावरणिक चरों में उत्पन्न गति का अध्ययन इस पद्धति का महत्वपूर्ण एवं एकमात्र आधार होता है . इस आधार किया गया मूल्यांकन हमें किसी भी देशकाल से सम्बंधित व्यक्ति, घटना अथवा विचार की सही भूमिका और प्रासंगिकता से अवगत करा सकता है . वह व्यक्ति, घटना अथवा विचार यदि भूतकाल से सबद्ध है तो हम वर्तमन समय में उसकी भूमिका के प्रभाव की व्याख्या कर सकते हैं अन्यथा इसी प्रणाली को आधार बना कर हम वर्तमान समय की किसी सक्रियता की भूमिका का भविष्य में प्रभाव निर्धारित कर सकते हैं .

अब कहने की जरुरत नही कि आज यह सब बातें उसी तेईस वर्षीय युवा के लिए स्मरण आ रही है जिसने बिना हिंसा प्रदर्शन के एक देश की तथाकथित असेम्बली में विस्फोट कि योजना को अंजाम देकर वैश्विक परिवर्तनकामी राजनीती के फ़लक पर अपना नाम नक्षत्रों से दैदीप्यमान शब्दों में उकेर दिया। ऐसे योद्धा की सक्रियताओं पर प्रकाश डालने , उनकी राजनीती और उनके द्वारा विरोध के लिए इस्तेमाल कि गई प्रनालिओं पर चर्चा के लिए एवं उनके मनस्वी व्यक्तित्वों पर टिप्पणी करने के लिए किसी दक्ष लेखक को भी शब्दों का अभाव, उपमाओं का अकाल और संकल्पनाओ का सूखा झेलना पड़ सकता है, मुझमे भी यह क्षमता नही है .एक अंदेशा यह भी की महामानवों की तरह पूजित व्यक्तित्व का निरपेक्ष मूल्यांकन शायद बहुसंख्यक को नागवार गुजरे और लोग आक्रोशित हों। 

बहुधा यह देखा गया है कि साधारणतया आभामंडल के प्रभाव का सहारा हम इसलिए लेते हैं कि उस व्यक्ति को महान घोषित करके अपने कर्त्तव्यों कि इतिश्री कर लें। भगत सिंह के बारे में भी यह कमोबेश सच है। कभी संसदीय वामपंथ भी उनकी उपलब्धियों और दिशा का सही उपयोग भारतीय जनता के हित में न कर पाया , और अब इसकी उम्मीद भी नही है.

देखना होगा कि उस भारतीय युवा क्रन्तिकारी ने परतंत्र भारत में अंग्रेजी शासन के विरोध के लिए उस वक्त प्रचलित तरीकों को दरकिनार करके विरोध के नितांत नए हथियार अपनाये . जिसने स्वतंत्रता और क्रांति को नयी परिभाषा दी, परिवर्तन की संस्कृति को नए अर्थ दिए वह कोई कुशल कूटनीतिग्य नही था फिर भी उसने नीति -ज्ञेयता को नए आयाम दिए. युद्ध की पारिवेशिक क्रूरता से घिरे भारत में नैतिक - अनैतिक की देशव्यापी बहस का आगाज किया . यह आज का दिन उसी तेइस वर्षीय युवा को समर्पित है जिसने क्रांति को इन शब्दों में परिभाषित किया।"

"By "Revolution", we mean the ultimate establishment of an order of society which may not be threatened by such breakdown, and in which the sovereignty of the proletariat should be recognized and a world federation should redeem humanity from the bondage of capitalism and misery of imperial wars." (Statement of S. Bhagat Singh and B.K. Dutt in the Assembly Bomb Case)

"क्रांति से हमारा तात्पर्य समाज की ऐसी व्यवस्था की स्थापना जिसमें किसी प्रकार के अव्यवस्था का भय न हो, जिसमें मज़दूर वर्ग के प्रभुत्व को मान्यता दी जाए, और उसके फलस्वरूप विश्व संघ पूंजीवाद के बंधनों, दुखों तथा युद्धों की मुसीबतों से मानवता का उद्वार कर सके."

आज यह बार - बार दोहराए जाने कि जरुरत है कि भगत सिंह दूरदर्शी थे। समानतावादी थे। साम्यवादी थे। 

जब लोगों के लिए पराधीन भारत में अंग्रेजी शासकों के विरोध की भावना धर्म से प्रेरित थी वे नास्तिक थे। हम जानते हैं कि चापेकर भाइयों आदि के स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा हिंदुत्व की भावना से प्रेरित थी और ऐसा होना स्वाभाविक भी था पर वे (भगत सिंह) दूरगामी और साफ़ दृष्टि वाले ऐसे विचारक थे जो शोषण के लिए पूंजीवाद के अंत को एकमात्र तरीका मानते थे . खैर , इस सन्दर्भ में अधिक जानकारी के लिए आप प्रोफ़ेसर चमनलाल की पुस्तक "भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज " पढ़ सकते हैं। मैं इसके संदर्भो का जिक्र नही कर रही न ही इस टिप्प्णी का यह प्रयोजन है .

जहाँ अन्य सब के लिए अंग्रेज विदेशी आक्रमणकारी भर थे जिन्हें इस देश से बाहर निकल कर धर्म द्वारा निर्देशित राज्य की स्थापना ही एकमात्र उद्देश्य एवं स्वपन था भगत सिंह ने विचारों में , कार्यकलापों में धार्मिक प्रभाव की उपस्थिति की हर संभावना को ख़ारिज किया है . उनके द्वारा लिखित महत्वपूर्ण दस्तावेज "मैं नास्तिक क्यों हूँ " में उनके विचारों की स्पष्ट छाप हमें देखने को मिलती है . फिर सवाल यह उठता है क्या ऐसी प्रेरणा थी जिसने धर्मिक कारणों से इतर किसी और कारन से उस तेइस वर्षीय युवक को असेम्बली में बम विस्फोट कर के फांसी पर चढ़ जाने को प्रेरित किया. जैसा की भगत सिंह खुद मानते थे की पहले वे एक रूमानी क्रन्तिकारी थे इस वजह से उनके द्वारा लिखित बाद में दस्तावेजों पर ध्यान केन्द्रित करना ही उन्हें विचारों को समझने का उचित स्रोत हो सकता है। कहना न होगा एक व्यक्ति के रूप में वे समझ गए थे कि उपनिवेशवाद वस्तुतः पूंजीवाद का ही एक हथियार है, इसलिए उन्होंने केवल स्वतंत्रता पर नही क्रांति पर जोर दिया।

तमाम निष्कर्षों को देखते हुए कहा जा सकता है , भारतीय साम्यवाद के उन अप्रतिम योद्धा को फिर से समझे जाने कि जरुरत है , उन्हें सही तरीके से जनता के मध्य ले की जरुरत है।

तो फिर से इस परिभाषा को याद करना होगा "By Revolution, we mean the ultimate establishment of an order of society which may not be threatened by such breakdown, and in which the sovereignty of the proletariat should be recognized and a world federation should redeem humanity from the bondage of capitalism and misery of imperial wars. “This is our ideal, and with this ideology as our inspiration, we have given a fair and loud enough warning."

  - लवली गोस्वामी 

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