Friday, May 10, 2013

ईश्वर सब देख रहा है!


व्यंग्य

पता नहीं कौन लोग रहें होंगे, कैसे लोग रहे होंगे जिन्होंने ईश्वर को बनाया। और बनाए रखने के लिए तरह-तरह की स्थापनाएं और दलीलें खड़ी कीं। मैं जब कभी इन तर्कों की ज़द में आ जाता हूं, मेरी हालत विचित्र हो जाती है। ईश्वरवालों का कहना है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है, वह सब कुछ देख रहा है। थोड़ी देर को मैं मान लूं कि यह बात सही है तो! होगा क्या ?
मैं बाथरुम में नहा रहा हूं। एकाएक मुझे याद आता है कि बाथरुम में मैं अकेला नहीं हूं, कोई और भी है। कोई मुझे टकटकी लगाकर देख रहा है! और ख़ुद दिख नहीं रहा है। यानि कि बदले में मैं कुछ भी नहीं कर सकता। हे ईश्वर, यह तू क्या कर रहा है!? कई दिन बाद तो साफ़ पानी आया है नलके में और तू ऊपर खूंटी पर चढ़कर बैठ गया! मैनर्स भी कोई चीज़ होती है, कृपानिधान! एक दिन तो ढंग से नहा लेने दे!

आपको याद होगा जब आप अपने एक परिचित के घर पाखाने में विराजमान थे, चटख़नी ख़राब थी, किसीने बिना नोटिस दिए दरवाज़ा खोल दिया और आप पानी-पानी हो गए थे। और इधर तो टॉयलेट में ईश्वर मेरे साथ है! अब क्या करुं! यह सर्वत्रविद्यमान किसी भी ऐंगल से आपको देख सकता है-ऊपर से, नीचे से, दायें से, बायें से...कहीं से भी। मन होता है कि क्यों न पटरी किनारे खेत में चलकर बैठा जाए! अब बचा ही क्या! सारी प्रायवेसी की तो ऐसी की तैसी फेर दी ईश्वर महाराज ने।

यह ग़ज़ब फ़िलॉस्फ़ी है कि ईश्वर सब कुछ देख रहा है और कह कुछ भी नहीं रहा। इससे ही बल मिलता होगा कर्मठ लोगों को। वह आदमी भी तो कर्मठ है जो सिंथेटिक दूध बना रहा है। वह बना रहा है और ईश्वर बनाने दे रहा है। तो सीधी बात है ईश्वर उसके साथ है। तो डरना किससे है फिर !? इसीलिए वह मज़े से होली-दीवाली पर छोटे डब्बेवालों को इंटरव्यू देता है। मुंह पर ढाटा क्यों बांध रखा है इसने!? शायद प्रतीकात्मक शर्म है यह! वरना तो उसे पता ही है कि चैनलवाले और देखने वाले, सभी ईश्वर के माननेवाले हैं। मैं सिंथेटिक दूध बनाता हूं तो ये सिंथेटिक ख़बरें बनाते हैं। सब एक ही ख़ानदान के चिराग़ हैं, एक ही ईश्वर की संतान हैं।
ऐसे कर्मठ लोग भरे पड़े हैं हर धंधे में। ईश्वर उनको देख रहा है मगर कह कुछ भी नहीं रहा! करने का तो फिर सवाल ही कहां आता है!

ईश्वर को यह बात अजीब लगे कि न लगे, मुझे बहुत अजीब लगती है।

-संजय ग्रोवर


162 comments:

  1. http://eeshay.com/does-god-help-atheists-and-oppose-godmen-as-omg-depicts/58188/?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+EeshaySansthanJabalpur+%28Eeshay+Sansthan+Jabalpur%29

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  2. अपने को तो पक्का पता है इस बात पर चर्चा का कोई फायदा नहीं है

    जीवन की पाठशाला में अनुभवों के पाठ पढ़ कर बड़े बड़े नास्तिक बाद में आस्तिक बनते देखें हैं .

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    1. नास्तिकता मनुष्य के लिये कोई सरल स्थिति नहीं है। कोई भी मूर्ख अपने आप को आस्तिक कह सकता ह॥

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    2. जो परिस्थिति देख कर आस्तिक बने वो कैसा नास्तिक

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  3. अब बाथरूम की क्या शर्म,उसने तो आपको आपकी माँ के गर्भ में ही नंगा देख लिया था.:)वह बेहतर जानता है नंगा नहायेगा क्या? और निचोडेगा क्या?

    उसे तो पता है जब काल पूर्ण हो जाता है तो टॉयलेट में शर्माने वाली इस नश्वर देह का पाखाना छूट जाता है पर वह घृणा नहीं करता दीन रोगी से.... :)

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    1. वाह सु्ज्ञ जी, आप को तो आप की मां ने भी नंगा देख रखा है, एक बार नहीं बार-बार तो क्या आप अब भी अपनी मां के सामने नंगा होने का साहस कर सकेंगे?

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    2. अच्छा!! तो बात शर्माने वाली नहीं है :) अब ईश्वर के सामने बडे हो गए हो इसलिए साहस ने जबाब दे दिया है,बाथरूम में ईश्वर के आभास मात्र से डरते हो? कैसे नास्तिक हो?

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    3. ओझा जी,
      हाँ, माँ ने मुझे अनेकों बार नग्न देखा होगा,नहलाया होगा, ऐसा करके उलट मुस्काई, इठलाई सहनशील रही होगी. किंतु वे बचपन के दिन स्मरण करके मैं ग्लानि से भर नहीं जाता, मुझे दुख नहीं होता कि माँ ने मुझे नग्न देख लिया था. यहाँ तक कि ऐसे छोटे छोटे हीन समझे जाने वाले अवसरों पर उसने मुझे देखा, ध्यान रखा, इसिलिए माँ मेरे लिए भगवान का स्वरूप है. ऐसे मौके पर माँ द्वारा घृणा न किए जाने पर ही तो कृतज्ञ हूँ.

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    4. आपसे में सहमत हूँ सुज्ञ जी

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    5. आपने भी आपकी लडकी को बचपन में नंगा देखा होगा तो क्या जवानी में भी देखोगे

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  4. आपकी धार्मिक भाषा अविस्मरणीय है सुज्ञ जी। पाखाना तो सभी का छूटता है, आपका क्या पेट में ही जमा होता रहता है? जब वह लोगों को मां के गर्भ में नंगा देख रहा होता है, आपको साथ ले जाता है क्या? अआपके शौक कितने मिलते-जुलते हैं, लगता जिंदगी यही सब करते बीती है।

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  5. आपकी धार्मिक भाषा अविस्मरणीय है सुज्ञ जी। पाखाना तो सभी का छूटता है, आपका क्या पेट में ही जमा होता रहता है? जब वह लोगों को मां के गर्भ में नंगा देख रहा होता है, आपको साथ ले जाता है क्या? आपके शौक कितने मिलते-जुलते हैं, लगता है जिंदगी यही सब करते बीती है।

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    1. मिलते-जुलते...... :)

      आत्मा सो ही परमात्मा.....

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    2. संजय जी ये कैसा व्यंग्य है ।

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  6. साधारण जी, अगर आपको पक्का होता तो यह कमेंट न करते। इसीसे पता चलता है कि मामला कच्चा है। आपके हिसाब से तो सब ईश्वर की मर्ज़ी से होता है, यानि नास्तिक भी उसने बनाए हैं। तो बाद में उन्हें आस्तिक क्यों बनाएगा? वह भी आस्तिकों की संख्या बढ़ा-बढ़ाकर और गिन-गिनकर आदमी की तरह ख़ुश होता है और अपने अहंकार को थपथपाता है!? उसे क्या चुनाव लड़ने हैं!?

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    1. अगर आप ध्यान दें तो पायेंगे कि मैने लेख से जुडी किसी बात को अपने कमेन्ट में शामिल नहीं किया है और इसलिए मैंने कहा की "अपने को तो पक्का पता है इस बात पर चर्चा का कोई फायदा नहीं है " ..

      @इसीसे पता चलता है कि मामला कच्चा है।

      वैसे क्या मैं ये मान लूँ की आप या तो बहुत जल्दी निष्कर्ष निकाल लेते हैं या फिर आपने निष्कर्ष अपने हिसाब के ही होते हैं

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    संजय जी,

    अच्छा व्यंग्य है... मुझे एक बात जो हैरान करती है वह यह कोई बहुत अधिक दिमाग नहीं लगाना पड़ता इस नतीजे पर पहुंचने के लिये कि वह नहीं है, यह एक सहज निष्कर्ष है किसी भी uncluttered मानव मस्तिष्क के लिये... हम में से ज्यादातर उसे पूजते हैं क्योंकि हमारे माता-पिता व पूर्वज भी उसे पूजते हैं उसी लकीर पीटते रहने वाले हम उसके प्रति वफादारी साबित करने और उसे खुश करने को हर जतन करते रहते हैं...

    रही बात बुढ़ापे में आस्तिक बन जाने की... तो सठियाया दिमाग तो कुछ भी कर सकता है... यह कौन बड़ी बात है मित्र गौरव :)

    चाहे ईश्वर का बखान करने को ही की गयी हो, पर सुज्ञ जी की यह टीप यह तो बताती ही है कि This world is full of people, who don't practice what they preach. पर संजय जी, मैं आपकी जगह होता तो कोई जवाब नहीं देता, नास्तिकों और आस्तिकों में कुछ फर्क तो बने ही रहना चाहिये कि नहीं ?


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    1. @रही बात बुढ़ापे में आस्तिक बन जाने की... तो सठियाया दिमाग तो कुछ भी कर सकता है.

      प्रिय मित्र प्रवीण, मेरी कही बात का एज से कोई कनेक्शन नहीं है, अनुभव तो किसी भी उम्र में हो सकता है ना?

      @मैं आपकी जगह होता तो कोई जवाब नहीं देता, नास्तिकों और आस्तिकों में कुछ फर्क तो बने ही रहना चाहिये कि नहीं ?

      वैसे आपने ये संजय जी से कहा है फिर फिर भी मैं आपको बताना चाहूँगा की आपके और मेरे विचार कितने मिलते हैं .. मैंने फेसबुक पर इस लिंक को देते हुए लिखा है की "इस लेख को पढ़ें और आनंद लें ( बहस का कोई फायदा नहीं :) "

      फर्क सिर्फ इतना है की मैं आस्तिक और नास्तिक का विभाजन ले कर नहीं चलता


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      प्रिय मित्र गौरव,

      एक लंबे समय के बाद आपसे संवाद होना सुखद है, मुझे यह इसलिये भी अच्छा लगता है क्योंकि आप एक खुला दिमाग रखते हो... आप जिन अनुभवों के किसी भी उम्र में होने की बात कर रहे हो उन अनुभवों के कुछ उदाहरण थोड़ा विस्तार से दीजिये... तब ही कुछ कह सकूँगा उन पर... अपनी बोलूँ तो रोजाना अनुभव उसके न होने का ही होता है... एक ऐसा अनुभव शायद इस सफेद बकरी को भी हुआ :(

      http://www.praveenshah2.blogspot.in/2013/05/blog-post_12.html



      ...

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    3. प्रिय मित्र प्रवीण- आपसे चर्चा कर पाना मेरा सौभाग्य है ... दरअसल आजकल समय की कमीं से ऑनलाइन आना भी कम ही हो पाता है . रही बात अनुभव की तो अनुभव अपने हों या दूसरों के, ऑनलाइन समझा पाना किसी के लिए संभव नहीं होगा .. अनुभवों की बात ना भी करें तो भी तो वेद उपनिषद का निरपेक्ष अध्ययन तो सोच के दायरे को विस्तार दे ही सकता है ..

      आपके लिए एक लिंक है .. जरा देखिये तो .. आपको अवश्य पसंद आएगा ( सहमत होना या ना होना एक अलग बात है) .. संभवतया अपनी बात कहने का ये सबसे आसान और मनोरंजक तरीका होगा :)

      http://www.youtube.com/watch?v=pcCL-MDhhGw

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    4. वैसे हो सकता है इसे देख कर किसी को कोई नया व्यंग सूझ जाए .... अगर ऐसा हो तो मेर निवेदन रहेगा की वो लेख लिखने से पहले एक बार वेदों और उपनिषदों का अध्ययन , चिंतन करें .. हो सके तो किसी एक्सपर्ट से मार्गदर्शन लें ..आगे उनकी अपनी मर्जी

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    5. प्रवीण जनाब,
      बस एक आप और ये संजय जनाब दोनो ही है इस दुनिया में कथनी करनी एक समान करने वाले.... अब देखो न जिस मानसिकता को आपने अच्छा व्यंग्य कहा है कि बाथरूम और टॉयलेट में ईश्वर के देख लेने से डरने वाली बात में मैंने उसी में दो जगह और जोडी है. ताकि आपका व्यंग्य पूरा हो. एक समान बात होने के बाद भी आवेश में चक्करघिन्नी होने की क्या बात थी?
      खैर,यदि पहले पता होता कि यहां टिप करना, आप जैसे विनम्र लोगों के सरल स्वभाव को उग्र बनाने का काम होगा तो मै तो नहीं करता. वाकई 'साधारण पाठक' बेहतर जानता था, यहां बहस का कोई लाभ नहीं.... इन्हें इनके कर्मों पर ही क्यों न छोड दें....

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  8. आपने लेख पर कुछ नहीं लिखा तो यह प्रतिक्रिया किस पर है!? यह प्रतिक्रिया आपने इस लेख से पहले ही क्यों नहीं दे दी!? बहरहाल मेरी आदत है कि ज़रुरत पड़े तो मैं हास्यास्पद और बचकाना बातों का भी विस्तार से जवाब देता हूं। उसकी वजह साफ़-साफ़ यह है कि ईश्वर के आधार और विस्तार की जड़ में हास्यास्पद और बचकाना बातें ही हैं।
    यह प्रवीन जी की विनम्रता का शायद चरम है कि वे आपको ख़ुले दिमाग़ का मान रहे हैं।
    जिन्होने वेद और जो भी आपने कहा वो सब लिखा उन्होंने किस क़िताब का अध्ययन किया था और किस ऐक्सपर्ट से सलाह ली थी!? क्या आप जैसे तथाकथित ‘एक बेहद साधारण पाठक’ से ?
    किसी क़िताब में क्या लिखा है यह उसे पढ़नेवाले ज़्यादातर लोगों के आचरण से पता चल जाता है।
    मैं अपना वक्त बरबाद करने में यक़ीन नहीं रखता।
    ऐसी चीज़ों में तो बिलकुल भी नहीं जिनसे एक स्वस्थ हंसी तक न पैदा हो सके।

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  9. @आपने लेख पर कुछ नहीं लिखा तो यह प्रतिक्रिया किस पर है!?

    -मित्र प्रवीण की टिप्पणी पर

    @यह प्रतिक्रिया आपने इस लेख से पहले ही क्यों नहीं दे दी!?

    -मुझे अंदाजा था लिंक (जो की गूगल पर समय दे कर ढूँढा गया) सहित दी गयी प्रतिक्रया बेकार ही जायेगी ( जैसे की अभी जा रही है ) वैसे मेरे पास और भी सामग्री हैं ... जब कोई अध्ययन को लालायित व्यक्ति दिखेगा तब दे दूंगा

    @बहरहाल मेरी आदत है कि ज़रुरत पड़े तो मैं हास्यास्पद और बचकाना बातों का भी विस्तार से जवाब देता हूं।

    - मैं भी :)

    @उसकी वजह साफ़-साफ़ यह है कि ईश्वर के आधार और विस्तार की जड़ में हास्यास्पद और बचकाना बातें ही हैं।

    -ये तो आपका अपना विचार है

    @ यह प्रवीन जी की विनम्रता का शायद चरम है कि वे आपको ख़ुले दिमाग़ का मान रहे हैं।

    - सही कहा।।। प्रवीण जी विनम्र तो हैं

    @जिन्होने वेद और जो भी आपने कहा वो सब लिखा उन्होंने किस क़िताब का अध्ययन किया था

    - वेदों और उपनिषदों का !

    @किस ऐक्सपर्ट से सलाह ली थी!?

    - एक्सपर्ट से मेरा आशय कोई ऐसे विवेकवान व्यक्ति जो वेदों पर रीसर्च / अध्ययन कर रहें हो या कर चुके हों से है , जिन्हें मैंने पढ़ा वे अधिकतर अपने समय के पढ़े लिखे विद्वान रहे हैं

    @किसी क़िताब में क्या लिखा है यह उसे पढ़नेवाले ज़्यादातर लोगों के आचरण से पता चल जाता है।

    -इंसान वही देखता है जो वो देखना चाहता है .... जैसे "शायद" आप ढोंगियों की भीड़ में आस्तिकों को ढूंढते हैं और मैं हर भीड़ में सिर्फ कर्मशील ( और विचारवान) लोगों को चाहे उनसे मेरे विचार मेल ना खाते हों

    @मैं अपना वक्त बरबाद करने में यक़ीन नहीं रखता। ऐसी चीज़ों में तो बिलकुल भी नहीं जिनसे एक स्वस्थ हंसी तक न पैदा हो सके।

    इस तरह की बातें अवश्य ही एक खुले दिमाग की पहचान होती हैं तो मैं तो बंद दिमाग का ही अच्छा :)

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    1. वाह क्या जवाब दिया है

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    2. नास्तिक बन्ने के लिए आपको वेद और उपनिषद् पढने की आवश्यकता नहीं है. उसके लिए तो common sense ही काफी है.

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  11. मैंने कहा कुछ है आपने जवाब कुछ और दिए हैं।
    यह मित्र प्रवीण की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया है-

    {एक बेहद साधारण पाठकMay 11, 2013 at 2:35 AM
    अपने को तो पक्का पता है इस बात पर चर्चा का कोई फायदा नहीं है

    जीवन की पाठशाला में अनुभवों के पाठ पढ़ कर बड़े बड़े नास्तिक बाद में आस्तिक बनते देखें हैं .

    Reply}

    अगर दुनिया में सभी यही सोचते कि बिना किसी विद्वान(?) की पुस्तक पढ़े कुछ नहीं लिखना चाहिए तो दुनिया की पहली क़िताब कभी लिखी ही नहीं गयी होती।
    ईश्वर की अनुपस्थिति और निरर्थकता को समझने के लिए मुझे किसी भी दस-पांच हज़ार साल पुरानी क़िताब पढ़ने की क्या ज़रुरत? मैं तो कहूंगा कि क़िताबे पढ़ने से ज़्यादा आदमी को अपना दिमाग़ इस्तेमाल करने की कोशिश करनी चाहिए।
    मित्र प्रवीण ने भी विनम्र सलाह दी है और मुझे भी महसूस हो रहा है कि आपसे बात करना निरर्थक है।

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    1. पहली बात - शायद आज आप सचमुच बड़ी जल्दी में हैं, दूसरी बात- आप ब्लागस्पाट पर दी रिप्लाई सुविधा का भी प्रयोग नहीं कर रहे हैं और मुझसे एक्स्ट्रा समझदारी की उम्मीद कर रहे हैं , तीसरी बात- मैं उस बात पर पहले ही उत्तर दे चूका हूँ . एक बार फिर से देखिये

      @ईश्वर की अनुपस्थिति और निरर्थकता को समझने के लिए मुझे किसी भी दस-पांच हज़ार साल पुरानी क़िताब पढ़ने की क्या ज़रुरत?

      मुझे तो सबके व्यूज जानना अच्छा लगता है .कईं बार पुराने व्यूज हमारे लिए नए होते हैं .

      और हाँ आपसे बात करना निरर्थक नहीं गया .. एक गलत फ़हमी दूर हो गयी मेरी

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  12. आज आप काफ़ी जल्दी में हैं.....!?
    पहले कब मिले आप मुझसे!? हांलांकि आपके प्रोफ़ाइल से साफ़ है कि नाम भी नकली है और तसवीर भी। ‘साधारण’ के आगे भी ‘बेहद’ लगा है, यानि कि वही ‘आम आदमी’ वाली बनावटी विनम्रता।
    फ़िर बहस में संदर्भ से हटकर जवाब देना या बिन मांगे सलाह देना कि यह क़िताब पढ़िए वह क़िताब पढ़िए।
    अगर सब कुछ क़िताबों में है तो अपना दिमाग़ निकलवा क्यों नहीं देते!?
    मेरा साफ़ मानना है कि जिनके पास अपना कोई दिमाग़ और चिंतन नहीं है सिर्फ़ क़िताबी तोतारटंत है, उन्हें बहसों में नहीं उतरना चाहिए, दूसरों के वक्त की कुछ कद्र करनी चाहिए।
    ज़रुरी नहीं की टुच्ची और घटिया बातें जिनमें इंसान को इंसान से नीचा करने के षड्यंत्र भरे पड़ें हों, उनमें सबको ‘व्यूज़’ दिखाई पड़ें।
    अब कृप्या माफ़ करें।

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    1. @अगर सब कुछ क़िताबों में है तो अपना दिमाग़ निकलवा क्यों नहीं देते!?

      -हा हा . वो इसलिए क्योंकि मैं बिना दिमाग के पढ़ नहीं पाऊंगा :)

      -मेरी प्रोफ़ाइल पर अभी अभी ध्यान गया आपका शायद और मेरी विनम्रता भी बनावटी है क्योंकि मैं आस्तिक हूँ ....सचमुच काबिले तारीफ बात है .

      आप क्यों मुझे विनम्रता ( असली वाली) से माफ़ी मांग कर मुझे शर्मिन्दा कर रहे हैं? :)

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  13. आप लोगों को भ्रम में जीने की कितनी आदत और सुविधा है!? एक ने भद्दी भाषा में बेतुका कमेंट किया, दूसरा पहले ही कमेंट से सरासर झूठ बोल रहा है कि मैंने इस लेख पर कमेंट नहीं किया। इसके बाद भी दोनों का जवाब दिया। सरासर झूठ बोलकर अगला यह भी ठोंके दे रहा है कि बुढ़ापे में अच्छे-अच्छे नास्तिक भी आस्तिक बन जाते हैं। हांलांकि इसका कोई प्रमाण या उदाहरण अगले ने नहीं दिया।
    इसका दूसरा अर्थ यह भी निकलता है कि जो लोग जवानी में ही आस्तिक बन जाते हैं वे जवानी में ही बूढ़े हो जाते हैं।
    सही बात यह है कि एक छोटे-से व्यंग्य का भी आपसे कोई जवाब न बन पड़ा तो बौखलाकर इधर-उधर की बातें शुरु कर दी। और ऊपर से उसी व्यंग्य के लेखक को पता नहीं कौन-कौन-सी क़िताबें पढ़ने की सलाह भी दे डाली। वह लेखक ज़रुर सोचेगा कि जिन क़िताबों ने इनको इतना ठस्सबुद्धि बना दिया कि एक व्यंग्य से बौखलाकर अल्लम-गल्लम हरकतें कर रहे हैं, उन्हें पढ़कर मैंने भी ठस्सबुद्धि बनना है क्या!? सारे भारत को बुद्धुओं की टकसाल बनाना है क्या!?
    बख़्शों महाराज! बहुत हो गया। हमें भी बख्शो और इस देश को भी बख्शो।

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    1. "सारे भारत को बुद्धुओं की टकसाल बनाना है क्या!?
      बख़्शों महाराज! बहुत हो गया। हमें भी बख्शो और इस देश को भी बख्शो।" शानदार बहुत खूब, जब किसी को कोई बात समझ नहीं आती तो कहता है "ऊपर वाला जाने"।

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  14. .
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    @ "इन्हें इनके कर्मों पर ही क्यों न छोड दें"

    बहुत बहुत आभार महामना...आपका यह स्नेह और यह कृपा ही हमारा संबल है !... :)

    यह तो थी मजाक की बात, पर एक गंभीर बात भी कहना चाहूँगा मित्रों, वह यह कि 'वह' हो या न हो, हमें देखता हो या न हो पर निश्चित तौर पर 'वह' इतनी गंभीरता से दिल पर लेने की चीज तो नहीं कि हम आपस में ही गर्मागर्मी कर बैठें... यह मसला तो ठंडे दिमाग से तर्क-वितर्क करने लायक है...

    सभी धर्मों/भौगोलिक क्षेत्रों के पुरातन ग्रंथों में उस समय की प्रचलित भाषाओं में उस दौर के उस आदमी द्वारा लिखी बातें जिसकी पास सूचनाओं, ज्ञान और चीजों को समझने के लिये आवश्यक सुविधाओं की बहुत कमी थी को आज भी पत्थर पर लिखे की भाँति उद्धरित करने से कुछ भी सिद्ध नहीं होता/ किया जा सकता है ...



    ...

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    1. मित्र प्रवीण,

      @निश्चित तौर पर 'वह' इतनी गंभीरता से दिल पर लेने की चीज तो नहीं कि हम आपस में ही गर्मागर्मी कर बैठें.

      गर्मागर्मी 'मैं' को गंभीरता से लेने की वजह से होती है 'उस' के लिए नहीं .. आपको भी ब्लॉग जगत का काफी अनुभव है ... आप, सुज्ञ जी और मेरे लिए ये कोई नयी बात नहीं

      @आज भी पत्थर पर लिखे की भाँति उद्धरित करने से कुछ भी सिद्ध नहीं होता/ किया जा सकता है

      पत्थर पर लिखे की भाँति उद्धरित करने का यहाँ तो किसी का मकसद नहीं दिखता लेकिन केवल एक बार पढने का कष्ट किये बिना कुछ भी कहते रहना मेरी समझ के बाहर है

      इसलिए मैं विभाजन अकर्मण्य और कर्मशील में करना बेहतर समझता हूँ

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    2. aap dono ke vichar achhe lage ki "us" par ladne ka vishay nhi "mai" ke liye bas kewal soch/anubhav ka aadan-pradaan hai. aur ye jaruri nhi ki mai aapke har shabd ko anumodit karun.

      shubh ratri, shubham bhavtu

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    3. @ आपका यह स्नेह और यह कृपा ही हमारा संबल है !... :)

      अपने निर्धारित मार्ग पर चलने की स्वतंत्रता संबल तो है ही. किंतु कर्म को किसी भी तरीके से समझा जाए, उसका भुगतान या प्रतिफल होता ही है और अधिकांश बार प्रत्यक्ष दिखता भी है.जब कोई उपाय न दिखता हो तो, कर्माधीन छोड देना ही एक मात्र उपाय है.

      @'वह' इतनी गंभीरता से दिल पर लेने की चीज तो नहीं कि हम आपस में ही गर्मागर्मी कर बैठें...

      'मैं' या 'हम' अन्य किसी से भी बडे हो जाते है,जैसा की इस वाक्य में 'हम' को ही गम्भीरता से लिया गया है,घोर घमण्ड झलकता है. और अभिमान पूर्वक कही गई बात हमेशा सच से दूर ही रह जाती है.

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  15. संजय जी का 'व्यंग्य' व्यंग्य के काबिल है। सुज्ञ जी ने इस व्यंग्य में छूटे अनछुए पहलुओं पर ध्यान देकर और गौरव जी ने इस व्यंग्य को अपने प्रतिक्रियाओं से हास्यास्पद बना दिया है।

    बुद्धि के एक स्तर वाले वास्तव में इसे बेहद पसंद करेंगे। मंदबुद्धियों को यह व्यंग्य लोटपोट कर सकता है। बालबुद्धि को गुदगुदायेगा। अनयूज्ड बुद्धि वालों को हतप्रभ कर देने का दम इसमें है।

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  16. और बेदिमाग़ इसपर बिलबिलाएंगे।

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  17. बहुत अच्छा लिखा है. ऐसे ही 'कुछ' विचार मेरे मन में भी आते हैं, सोचती हूँ अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार तर्क -वितर्क करती हूँ खुद से और कभी अपने पापा -मम्मी या गुरुजनों, मित्रों से .

    आस्तिकता और नास्तिकता अपने अपने पालन , पोषण व अनुभवों की मिली जुली सोच है, ऐसा मुझे लगता है .

    ईश्वर कौन है , है या नही इसपर कुछ कह पाना निश्चित नहीं क्यूंकि ईश्वर को मैंने भी नही देखा , ठीक उसी तरह जैसे अपने कई युग पहले के पूर्वजों को नही देखा है .

    सुनी तो बहुत है मैंने भी कई बातें जो अविश्वसनीय लगती हैं पर सुनी सुनाई पर यकीं करती नहीं आसानी से बिना तर्क -वितर्क (कुतर्क नहीं जो सिर्फ सामने वाले को /या किसी की सोच , आस्था को नीचा दिखाने के लिए हो ...

    पर ये यकीं से कह सकती हूँ की कुछ ऐसे अनुभव मुझे तो हुए हैं जो इस मस्तिष्क की पकड़ से परे हैं , विज्ञानं के तर्क से परे हैं .

    जिससे ये लगता है की कुछ है जो अज्ञात है. क्यूँ कैसे पता नहीं जैसे की आत्मा soul का अस्तित्व है जिसका वैज्ञानिक भी अनुमोदन करते हैं अपने परिक्षण के बाद.


    सुज्ञji की प्रतिक्रिया व उसपर औरों की प्रतिक्रिया पढ़ी आश्चर्य है सबने सबकुछ पढ़ा पर ये नही -- पर वह घृणा नहीं करता दीन रोगी से...

    उसी प्रकार अन्य ज्ञानी व्यक्तियों जैसे स्वयं लेखर संजयजी, प्रवीनजी, प्रतुल वशिष्ठजी के विचार भी पढ़े यहाँ . मैं केवल उनका उल्लेख कर रही हूँ जो मुझे अटपटी लगीं जैसे

    एक बेहद साधारण पाठक ki ye tippani
    अपने को तो पक्का पता है इस बात पर चर्चा का कोई फायदा नहीं है

    जीवन की पाठशाला में अनुभवों के पाठ पढ़ कर बड़े बड़े नास्तिक बाद में आस्तिक बनते देखें हैं .

    इसमें कहीं ये नजर नही आया की कुछ लोग वृद्ध होकर नास्तिक से आस्तिक बन जाते हैं --और बहस इसको लेकर काफी हुई है .... अनुभव तो किसी को कभी भी हो सकते हैं और उनपर व्यक्तिविशेष की प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है की उसकी सोच बदल सकती है या नहीं ....

    एक उदहारण मेरी दो बहुत ही प्रिय सखियाँ हैं , दोनों सहोदरा हैं और दोनों के बीच २ साल का अंतर है , बचपन से नास्तिक पर आज किन्ही कारणों से एक आस्तिक बन गई है , शायद इसी अनुभव का जिक्र किया गया उपर्युक्त टिपण्णी में पर इसमें नाराज होने वाली बात क्या थी समझ नही आई. ये लेखक के अपने अनुभव का उल्लेख है पर इसमें कहीं भी ''सब'' नही लिखा है.

    विचारों का स्वस्थ आदान प्रदान अच्छा लगता है पर कोई आपके विचार से भिन्न सोच रखे तो उसके लिए गलत शब्द प्रयोग करना.... जब कोई अपनी कृति समाज के सामने रखता है तो उसपर टिपण्णी भी होंगी और विषय के अनुसार कोई पक्ष में कहेगा कोई विपक्ष में. पर विपक्ष में कहने वाला जब तक किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप न लगाये तो उसे स्वस्थ रूप में लेना चाहिए ऐसा मैं समझती हूँ.

    जैसे कोई कहते हैं प्रेम होता है, कोई कहता हैं नही होता, तो क्या प्रेम नही होता?

    मैं तो ज्यादा 'knowledge' रखती नही हूँ न मैंने वेद आदि पढ़े हैं ..पर इतना जानती हूँ जहाँ विचार मिलते ही नही और स्वस्थ बातचीत नही हो सकती वहां बात बीच में ही छोड़ना बेहतर . दूसरे को उसके भिन्न विचारों के कारण अपशब्द कहूँगी तो मेरा चरित्र भी दिखेगा ना.... :)

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    1. प्रिटीजी, आभार आपका कि आपने सधैर्य इसपर प्रतिक्रिया की।
      कुछ ज़रुरी बातें कहना चाहूंगा।
      पूर्वजों से ईश्वर की तुलना अतार्किक है। हमें मालूम है कि हमारे दादा-नाना इंसान थे और इंसानों को हम सुबह-शाम देखते हैं। ईश्वर का मामला बिलकुल अलग है।
      जो अनुभव मस्तिष्क और विज्ञान की पकड़ से परे हैं उन्हें आप व्यक्तिगत उपलब्धि तो मान सकतीं हैं पर दूसरों पर उन्हें थोपने का आग्रह अनुचित है।
      सुज्ञji की प्रतिक्रिया .. पर वह घृणा नहीं करता दीन रोगी से...
      यह भद्दी भाषा में लिखी टिप्पणी का एक छोटा हिस्सा है। ‘वह घृणा नहीं करता दीन रोगी से’ इस वाक्य का किसी नास्तिक के लिए कोई भी अर्थ नहीं है।
      प्रेम, घृणा, क्रोध....सब मनुष्य के स्वभाव का हिस्सा है पर इनसे ईश्वर की तुलना का कोई अर्थ मेरी समझ में नहीं आता।
      आप ध्यान से पढ़ें, आपने, और किसीने भी व्यंग्य में जो कहा गया है उसपर कोई बहस नहीं की, इधर-उधर की बातें की हैं।

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    2. प्रेम, घृणा, क्रोध, भूख, प्यास, सुख, दुख किसी भी बच्चे को सिखाने नहीं पड़ते, वे बिना सिखाए ही उसके भीतर मौजूद होते हैं। जबकि ईश्वर के बारे में बच्चे को आए दिन सुबह-शाम बताना-रटाना पड़ता है। अगर ईश्वर है तो बच्चा भूख-प्यास से पहले ही उसे जान जाएगा, उसे बताना क्यों पड़ता है?

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    3. utaam baat kahi aapne, aapke ghar mein chhote bachche to honge hi mere 4 bhatije/i hain aur maine dekha hai unhe is sabka ka bhaan hai par fir bhi unhe sikhana padta hai bachche bhuli [hamare yahan chhoti behan]to nahi marte ya kabhi bade ko ki chhote ne mara par use iska abhaas nhi ki tumhe chot pahunchti hai.... ye prem ki baat sikhani padti hai ki apne se chhote ke liye sehansheel bano...

      jab ham kisi ko pasand nhi karte to anjane mein apne krodh ya apshabad dwara bachchon ko sikhate hain --ghrina!

      bachche ko toffee dekhar kehte hain aha--ye sikhana hai sukh ka....

      vaise ye mera alpgyan hai...

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    4. प्रिटी जी, यहां सवाल अल्प और वृहद ज्ञान का नहीं है। दुनिया में हर कोई अल्पज्ञानी है। वैसे भी ज्ञान सिर्फ़ सूचनाओं का भंडार है। असल बात यह है कि हम अपनी अक्ल से, दिमाग़ से उसका क्या इस्तेमाल करते हैं। और दिमाग़ इस्तेमाल करने का रिवाज अपने यहां है ही नहीं।
      आप दो साल के बच्चे को थप्पड़ मारिए, देखिए वह डरता है कि नहीं, रोता है कि नहीं। क्या आपने उसे रोना और डरना सिखाया था !? फिर आप उसे गुदगुदाईए, वह खिलखिलाएगा। क्या आपने सिखाया था!?
      इससे भी ऊपर, असली सवाल तो यह है कि भगवान के बारे में बच्चे को बताना और सिखाना कयों पढ़ता है!?

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    5. प्रिती स्नेह जी,

      आभार, आपने कमेंट के भावार्थ को समझा, बाकि लोग उसे समझ के भी नहीं समझना चाहते, या नास्तिकों के संदर्भ में उसके अर्थ से ही बचना चाहते है.

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    6. @ प्रेम, घृणा, क्रोध, भूख, प्यास, सुख, दुख किसी भी बच्चे को सिखाने नहीं पड़ते, वे बिना सिखाए ही उसके भीतर मौजूद होते हैं।
      प्रेम, घृणा, क्रोध, करूणा भूख, प्यास, तृप्ति-संतुष्टि, सुख, दुख मन के भाव होते है,भीतर मौजूद होते हैं। मौजूद होने के उपरांत भी उन्हें संस्कारित करना ही पडता है. बताना ही पडता है कि घृणा अनादेय है और प्रेम उपादेय है. क्रोध अनुचित है और करूणा भाव उचित है, भूख, प्यास स्वभाविक है किंतु संतुष्टि पर रूक जाना उत्तम निदान है. बताना ही पडता है कि सुख, दुख का सम्बंध मन की फिलिंग से ज्यादा है. पर्याप्त सुख के साधन हो फिर भी ईर्ष्या व तृष्णा सुख महसुस होने नहीं देती. और संतुष्टि दुख के बीच भी सुख का आनंद करा सकती है. भावों को इस प्रकार संस्कारित न किया जाय तो लोग अनावश्यक ही अनदेखी वस्तुओं से भी घृणा करते हुए जीवन तमाम कर देते है. सुख लेना न सिखाया जाय तो इंसान कल्पित दुखों से ही परेशान और तनावों में रहकर अपने संसार को ही क्रोध व आवेश की आग के हवाले कर देता है. अपने खाने के अधिकार में बावला होकर और खा-खाकर ही मर जाता है. इसलिए कदाचार से हतोत्साहित और सदाचार की प्रेरणा देनी ही पडती है. अगर प्राकृतिक भाव के भरोसे सिखाया संस्कारित न किया गया तो अच्छाई बुराई का भेद ही कैसे होगा और घृणा से मुक्ति कैसे होगी. बिना श्रम के तो बुराई की तरफ ढलना अवश्यम्भावी है.........हाथ कंगन को आरसी क्या?

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    7. बहुत उम्दा जवाब दिया है संजय सर

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  18. और भी बाते हैं, जब किसी लड़की स‌े बलात्कार हो रहा होता है तो भगवान चुपचाप देख रहा होता है...कितना अच्छा भगवान है स‌िर्फ स‌ब कुछ देखता रहता है.

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    1. सही कहा सर. ऐसे भगवान् की हमें कोई ज़रूरत नहीं. हम नास्तिक ही अच्छे है.

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  19. Sanjayji agar aap mera likha dhyan se padhenge to shuruwat mein aapke kathya par hi maine kaha hai... aur jo aapke apne vichar hain uspar behas kyun ho bhala kintu behas hui hai aage to AAPKE lekh se utpann hue bhaav par hi to hui hai.

    ye--बहुत अच्छा लिखा है. ऐसे ही 'कुछ' विचार मेरे मन में भी आते हैं, सोचती हूँ अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार तर्क -वितर्क करती हूँ खुद से और कभी अपने पापा -मम्मी या गुरुजनों, मित्रों से .

    आस्तिकता और नास्तिकता अपने अपने पालन , पोषण व अनुभवों की मिली जुली सोच है, ऐसा मुझे लगता है .

    ईश्वर कौन है , है या नही इसपर कुछ कह पाना निश्चित नहीं क्यूंकि ईश्वर को मैंने भी नही देखा , ठीक उसी तरह जैसे अपने कई युग पहले के पूर्वजों को नही देखा है .

    सुनी तो बहुत है मैंने भी कई बातें जो अविश्वसनीय लगती हैं पर सुनी सुनाई पर यकीं करती नहीं आसानी से बिना तर्क -वितर्क (कुतर्क नहीं जो सिर्फ सामने वाले को /या किसी की सोच , आस्था को नीचा दिखाने के लिए हो ...

    पर ये यकीं से कह सकती हूँ की कुछ ऐसे अनुभव मुझे तो हुए हैं जो इस मस्तिष्क की पकड़ से परे हैं , विज्ञानं के तर्क से परे हैं .

    जिससे ये लगता है की कुछ है जो अज्ञात है. क्यूँ कैसे पता नहीं जैसे की आत्मा soul का अस्तित्व है जिसका वैज्ञानिक भी अनुमोदन करते हैं अपने परिक्षण के बाद.
    maine aapke lekh par apne vichar likhe... ye jaruri nhi ki mai aapki har baat par haan mein haan milaoon.

    aur na aapke liye ya kisi ke liye bhi jaruri hai ki jo mai kahun usse sehmat hon. suryoday hota hai roj kabhi mujhe pyara lagta hai kabhi khinnta lata hai--ye to meri mansikta hai :) suraj to roj ek jaise hi ugta hai...

    Rahi aage ki baat to jab baat se baat chalegi to dur talak jayegi hi...

    jinhe dekha nahi hamare purvaj vo insaan the kaise kahien... hamare purvaj... agar vigyan ki maane to ek 'cell' wale jeev se jeevan ki shuruaat hui...

    vyaktigat anubhav hi aapas mein bataye jate hain to gyan badhta hai varna aaj jo kuchh ham jaante hain sab kuchh hamne parikshan to kiya nahi jaise prithvi gol hai.....

    सुज्ञji की प्रतिक्रिया .. पर वह घृणा नहीं करता दीन रोगी से...
    यह भद्दी भाषा में लिखी टिप्पणी का एक छोटा हिस्सा है।
    ye aap keh rhe hain par mujhe is hisse mein bhasha bhaddi najar nhi aai ..aap ishwar to nhi maante to jo dusre keh rhe uske anuhit kehna ya unki aastha ko galat kehna ye aapki pratikriya bhi galat hai....

    AB RAHI BAAT US AASTHA KI JO YE MANTI HAI ISHWAR HAI. to avashya sochne wali baat hai jo hota hai vo kyun hota hai.... agar maan lein ishwar hai to ye kaise janenge vo aisa kyun karta hai.... kyunki agar ham aapas mein bhi dekhein to ek hi baat par sabki pratikriya alag hoti hai...jaise AAPKA HI LEKH LEIN ......kisi ne halka si tippani ki kisi ne ise vyaktigat le liya to kisi ne apshabd bhi kahe apni baat ke dusre ke anumodan na karne par....

    koi jo karta hai aisa kyun karta hai ham jaan nhi sakte to us anjaan ki jo hai bhi to kahan, kaisa ke kritya ki kya kahein...

    vaise jo achha bura hota hai to vo kyun bura karta hai ye dard dene wali baat hai par tab vo kisi ko bahut sukh kyun deta hai, iski shikayat ham nhi karte ki hame itna jyada sukh kyun diya....

    sochti mai bhi hun aisa kyun hota hai.... aur mai to aap ki tarah gyani bhi nahi par meri alp buddhi sochti hai ki jaise ma kabhi kabhi chaku se haath katne deti hai ki sabak miley vaise hi kuchh hota hoga... aur is par kuchh bachche sabak lete hain kuchh kai baar chaku se haath katwa lete hain.....

    SHAYAD.....

    mai apne agle pal ki bare mein pratikriya nhi kar sakti to aur kisi ki kya karungi :)

    shubh ratri, shubham bhavtu

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    1. ईश्वर जिन तर्कों पर चलता है वे निहायत मामूली, हल्के-फ़ुल्के, कई बार हास्यास्पद बल्कि बचकाने होते हैं। उन्हें ज़रा-सा उलट दिया जाए तो वही तर्क ईश्वर के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं। ऐसा ही एक तर्क लेकर एक सज्जन मुझसे बात कर रहे थे कि ईश्वर नहीं है तो आदमी मर क्यों जाता है!? मैनें कहा अजीब बात है, मैं पूछता हूं कि आदमी को आखि़र मर ही जाना है तो ईश्वर के होने का मतलब क्या है!? वे थोड़ा हकबकाए। मैं कहता रहा, दुनिया-भर का टाट-कमंडल आदमी इकट्ठा करता है, इस बैंक में खाता, उस बैंक में खाता, सोना-जेवर, साड़ी-कपड़े......किसलिए!? कि एक दिन मर जाए!? और मरता भी बेचारा आसानी से नहीं, पहले खाल ढीली होती है, हड्डियां निकल आतीं हैं, चलना-फिरना बंद हो जाता है, तरह-तरह की बीमारियां लग जातीं हैं, पराश्रित हो जाता है, कई बार बहू-बच्चे दुर्व्यवहार भी करते हैं, कई तो आश्रमों में भी छोड़ आते हैं। और यह सब होता है ईश्वर की देख-रेख में!! ईश्वर की ऐसी क्या दुश्मनी है बुजुर्गों से!? अरे थोड़ा तमीज से भी तो मारा जा सकता है बुजुर्गवार को। ऐसे तड़पा-तड़पा के, सता-सता के मारना !? नहीं! अगर ईश्वर है तो आदमी को मरना नहीं चाहिए। और ऐसे तो बिलकुल भी नहीं मरना चाहिए।

      ऐसे ही एक बार कोई मुझे समझा रहा था कि देखो हर काम कोई न कोई करता है तभी होता है। यह स्कूटर है, आप किक मारोगे तभी चलेगा। इसी तरह के उदाहरण देते हुए बोले कि यह चांद निकलता है, रात होती है, सर्दी-गर्मी आती है.....यह सब अपने-आप कैसे हो सकता है? ज़रुर कोई शक्ति है जो इन्हें चलाती है ; वही ईश्वर है।
      मैंने कहा कि आप पक्का मानते हैं कि हर चीज़ को कोई न कोई चलाता है, बनाता है!
      बिलकुल, वे बोले।
      तो बताईए ईश्वर को कौन चलाता है? उसे किसने बनाया ?

      वे तो सकपका कर चुप हो गए मगर समझदार लोग जानते हैं कि किसने ईश्वर को बनाया और कौन उसे चलाता है।

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    2. @ सुज्ञji की प्रतिक्रिया .. पर वह घृणा नहीं करता दीन रोगी से...यह भद्दी भाषा में लिखी टिप्पणी का एक छोटा हिस्सा है।

      भाषा भद्दी किस तरह? क्या उसमें टॉयलेट पखाना नंगा या देखने आदि शब्दों के कारण भद्दी है? यदि ऐसे अनिष्ट जगह आदि के शब्दों के कारण भाषा भद्दी है तो महाशय आपका लेख भी तो उन्ही भद्दी जगह का उल्लेख कर भद्दा ही है. जो लेखक की दृष्टि या मानसिकता होगी,उसी पर ही तो केन्द्रित होकर कमेंट किया जाएगा. फिर भी अगर भाषा भद्दी है तो शरूआत की किसने?

      वे क़िताबें अगर ठस्सबुद्धि बना देती है तो इस सुरूचिपूर्ण व्यंग्य लेख में ठस्सबुद्धि का प्रयोग लेखक ने दिमाग खोल कर किया उसका स्रोत कौन सी किताबें है?

      @ एक ने भद्दी भाषा में बेतुका कमेंट किया

      भाषा का 'साम्य' तो बता चुका, अब देख लीजिए कमेंट का तुक....पहले वाक्य में मैंने कहा- "अब बाथरूम की क्या शर्म,उसने तो आपको आपकी माँ के गर्भ में ही नंगा देख लिया था.:)वह बेहतर जानता है नंगा नहायेगा क्या? और निचोडेगा क्या?" चुंकि लेख ही व्यंग्य था और विषय पर रहते हुए व्यंग्यात्मक शैली में ही प्रत्युत्तर उपयुक्त रहता इस लिए कहा गया कि बाथरूम या टॉयलेट में ईश्वर के उपस्थित रहने से आपको शर्म आ रही है तो शर्माने की आवश्यकता नहीं उसने सर्वत्र आपको इस स्थिति में देखा होगा, ग्लानि से भर जाने का कोई कारण नहीं है.आगे मैंने एक मुहावरे का प्रयोग किया है कि "नंगा नहायेगा क्या? और निचोडेगा क्या?" उसका सीधा सीधा अभिप्राय यह है कि जब आप ईश्वर के अस्तित्व को मानते ही नहीं तो उन जगहों पर उसकी उपस्थिति का संदेह आपके मन में क्यों है? जो चीज है ही नहीं,उसका आभास आपको क्योंकर होने लगा? आप उसके न होने पर पूरी तरह से आशान्वित है तो आपको यह बाथरूम या टॉयलेट में भय कैसा? सच्चे नास्तिक हो तो उसके न होने पर बिंदास रहो, उसके होने का आधार लेकर ही उसके न होने को प्रमाणित करने की क्या मजबूरी? ऐसी भी क्या विवशता कि जिसे सिरे से खारिज कर चुके उसी का बार बार उल्लेख करना पडे. वस्त्रहीन को नंगे होने की न तो शर्म होती है न मर्यादा खोने का डर. इसलिए "नंगा नहायेगा क्या? और निचोडेगा क्या?" जिसके लिए ईश्वर है ही नहीं वह शोध, खोज, विमर्श करके कौन सा निचोड पाएगा?

      अब दूसरे वाक्य में मैंने कहा- "उसे तो पता है जब काल पूर्ण हो जाता है तो टॉयलेट में शर्माने वाली इस नश्वर देह का पाखाना छूट जाता है पर वह घृणा नहीं करता दीन रोगी से.... :)
      यहाँ यही बताने का प्रयास किया गया है कि यह शर्म, घृणा, अरूचि उसके लिए कोई मायने नहीं रखती. जैसे अपनों का मृत शरीर अगर मल से लिप्त हो जाय तो भी उस शरीर से घृणा न करके उसे स्वच्छ करके उसकी अंत्येष्ठी की जाती है, माँ 30 साल के मानसिक रोगी बेटे को नहला-धुला सकती है. रोगी की सेवा लोग बिना उसकी शारिरीक गंदगी से घृणा किए करते है. इस तरह शरीर के गंदे कार्य या सामान्य दशा में एकांत स्थल भी दीनता व रूग्णता में घृणा की इजाजत नहीं देते तो शर्म की बात तो बहुत दूर की चीज है. इसीलिए उपकारी वह है जो "घृणा नहीं करता दीन रोगी से" वह दुख में कृपणतापूर्वक शर्म कोआगे कर मजाक नहीं बनाता. वह शरीर को सामान्य शरीर मानता है और जान को विशेष जान....

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    3. मेरे व्यंग्य में कहीं भद्दी भाषा नहीं है। यह व्यंग्य है उन अजीबोग़रीब धारणाओं पर जिन्हें ईश्वर के बारे में प्रचारित किया गया है। बताया गया है कि किस तरह ये धारणाएं हास्यास्पद हैं। ईश्वर अगर सब कुछ देख रहा है तो वह क्या-क्या देख रहा है, कहां-कहां सक्रिय है!! और जहां वास्तव में सक्रिय होना चाहिए, जहां बेईमानी हो रही है, बलात्कार हो रहा है वहां वह कतई निष्क्रिय है। वह किसलिए है फिर। यह सारी बातें बिना किसी अपशब्द का इस्तेमाल करते हुए कही गई हैं।
      दूसरी तरफ़ ‘नंगा नहाएगा क्या...‘ और ‘मां की कोख में नंगा देख लिया.....’ में हेकड़ी और अश्लीलता साफ़ है। प्रवीनजी ने कहा भी कि मैं तो जवाब ही न देता। आप और दस दिन लगाके आ जाईए फिर भी इस भाषा के भद्देपन और मंतव्य को छुपा नहीं पाएंगे।
      ‘वह घृणा नहीं करता...’ का ज़िक्र भी नास्तिक के संदर्भ में अप्रासंगिक है क्योंकि नास्तिक के लिए ईश्वर है ही नहीं। फिर आपको कैसे पता कि ‘वह घृणा नहीं करता.......’!? आपको क्या उसने कोई लिस्ट भेज रखी है कि किससे घृणा करता है किससे प्रेम!?
      ऐसे ही आपने लिखा कि वह ‘बेहतर जानता है कि नंगा नहाएगा क्या, और निचोड़ेगा क्या........’। कमाल है। आपको तो उसके बारे में सब मालूम है कि वह क्या बेहतर जानता है, क्या पसंद करता है, किसका पाखाना कब निकालता है........’
      आप क्या रोज़ उसके साथ मॉर्निंग वॉक पर जाते हैं? कि उसके साथ झूला झूलते हैं? उससे बड़े भगवान तो आप मालूम होते हैं!! उसने तो कभी ख़ुद आकर अपनी पसंद-नापसंद किसीको बताई नहीं मगर आप तो बड़े अधिकार से बताते फिर रहे हैं!!
      मेरे लेख का स्रोत कोई क़िताब नहीं बल्कि समाज में प्रचलित अंधविश्वास और झूठा प्रचार है। और झूठ को हटाना हो तो उसका नाम भी लेना पड़ता है। इतनी-सी बात भी आपकी समझ में नहीं आ रही!?
      और पहले से मौजूद भावों को संस्कारित करना अलग बात है और ज़बरदस्ती कोमल मन-मस्तिष्क में काल्पनिक ईश्वर घुसेड़ना अलग बात है। संस्कार भी सबके एक से नहीं होते और संस्कारित करने के तरीके भी।
      उन लोगों का क्या हो जिन्हें अपने अनुकूल पड़ती क़िताबे दूसरों को पढ़वाना दूसरे की कर्मठता लगती है। और दूसरा अपने दिमाग़ का इस्तेमाल करके कुछ करे-पढ़े तो अकर्मण्यता लगती है! मैं इन चालाकियों में नहीं फंसता। अपने समय का उपयोग अपनी समझ से करता हूं। मैं किसीको कुछ पढ़ने की सलाह भी नहीं देता। बहस चल रही है, हाथ के हाथ जवाब दो, तर्क करो, उदाहरण दो। कौन क्या पढ़के आया, क्या पढ़ता है, इससे क्या लेना!?
      उम्मीद है अगली बार कोई तुक वाली बात करेंगे।

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    4. अपने व्यंग्य में बाथरूम और टॉयलेट में ईश्वर को खडा करते हो फिर भी आपकी भाषा भद्दी नहीं? आस्तिकों की मजाक उडाते हो फिर भी आपकी हेकडी नहीं? क्या यह हास्यास्पद नहीं कि मारे ईर्ष्या के बौखलाए और अपने धंधे के आडे आते ईश्वर की निंदा में रात दिन एक करते हो, और अपनी वांछनाएँ पूरी नहीं पाते, उसका उल्लेख किए बिना चैन नहीं पाते,अजीबोग़रीब नहीं लगता?

      माँ की कोख में नंगा रहना अश्लील कैसे हो गया? क्या किसी को सलीके से कपडे पहने अवतरित होते देखा है? ईश्वर की छोडो, डॉक्टर भी बच्चे को नंगा देख लेता है, तो क्या जन्म लेना अश्लीलता हो गई?

      नास्तिकों के लिए ईश्वर है ही नहीं तो उसके निष्क्रिय रहने पर सवाल उठाने वाले नास्तिक होते ही कौन है? यदि आपके आलेख में अपशब्द नहीं है तो मेरी टिप्पणी में भी कोई अपशब्द नहीं है.बाथरूम टॉयलेट पाखाना आपके ही शब्द है और इन स्थलों से नग्नता जुडी हुई है.अतः आपके ही व्यंग्य को लौटाया है,दो मानक नहीं होते,गंदा व्यंग्य करते हो तो उसी तर्ज में सहने की आदत भी डालो!!!

      मैं तो आज भी नहीं लौटता अगर मेरा नाम लेकर टिप्पणीयाँ न की गई होती. आपको और प्रवीण जनाब को तो कबका आपके कर्मों के भरोसे छोड चुका था. यह दस दिन नेट से दूर था, अन्यथा असहनशीलता का इतना लम्बा उधार नहीं रखता.

      @ क्योंकि नास्तिक के लिए ईश्वर है ही नहीं। फिर आपको कैसे पता कि ‘वह घृणा नहीं करता.......’!? आपको क्या उसने कोई लिस्ट भेज रखी है कि किससे घृणा करता है किससे प्रेम!?

      हाँ लिस्ट पढी है हमने, सदाचार के आचार व्यवहार समझे है हमने. :) आप चुक गए..... आपको किताबें पढने की सलाह दी थी 'साधारण पाठक' नें वहीं सदाचारों की करूणा की पूरी लिस्ट थी. पर अपनी हेकडी में आप उसे इग्नोर कर चुके.... वह सबसे प्रेम करता है, दुराचारियों से या उसे न मानने वालों से भी घृणा नहीं करता. लेकिन घृणा आदि दुष्कर्मों से दूर रहने की सलाह अवश्य देता है,क्रोध, ईर्ष्या,ईगो आदि को बुरा स्वभाव कहता है. हां,उसके बारे में सब मालूम है, क्योंकि उसके बताए हित प्रद मार्ग को उन किताबों में पढा है. हमारा हिसाब तो सीधा है ईश्वर को माने या ना माने किंतु आपकी तरह 'ईश्वर' नाम से ही द्वेष के कारण उपदेशित सदाचारों से बैर रखकर अपना जीवन क्यों बदी, घृणा, क्रोध से भरा रखें?

      किताबों से तो आजन्म बैर है और 'प्रचलित अंधविश्वास और झूठा प्रचार' पर इतनी आस्था कि वो सारा सच है? गजब का अंधविश्वास है नास्तिकों का!!!! वो तो हमें मालूम है संस्कार सभी के एक जैसे नहीं होते..... लोग अनदेखे से घृणा द्वेष नफरत प्रतिशोध न जाने क्या क्या करते है और उसे अपने संस्कार भी मानते है.और तरीका भी बदले की भावना का उनका अपना होता है. आप अपने समय का उपयोग अपनी समझ से ही करें, शुभ और सात्विक विचार वाकई आपके अपने लिए फंसने जैसा ही है.इसी दिशा में दिमाग का स्वतंत्र इस्तेमाल करें. पढने पढाने से आपका कुछ भी सम्बंध नहीं है. यही मेरे तर्क है और यही तुक भरी बात. आपके संस्कार अलग हो सकते है अतः कोई उम्मीद मैं नहीं पालता. मुझे यह साबित नहीं करना कि ईश्वर है......मुझे तो यही साबित करना है कि जिन बेचारों के लिए ईश्वर नहीं है उन्हें इस एक शब्द ने ही परेशान कर रखा है. नहीं मानकर भी इनके दुख समाप्त नहीं होते, दूसरे क्यों मानते है यह संताप बहदवास से झेलते रहते है और बिना माँगे ही उसके न होने के तर्क ठेलते रहते है.... निर्थक!! अभिशप्त!!

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    5. आपकी तो बातें बहुत ही अजीब हैं। कह रहे हैं कि ‘अपने व्यंग्य में ईश्वर को टॉयलेट और बाथरुम में खड़ा.......’ अरे महाराज, यह मैं नहीं खड़ा कर रहा, आपकी धारणाएं और मान्यताएं कर रहीं कि-‘ईश्वर सब जगह मौजूद है’, ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है’, ‘ईश्वर सब कुछ देख रहा है’.....वगैरह। यही तो व्यंग्य है कि ये मान्यताएं इतनी विचित्र हैं कि इन पर विस्तार से सोचा जाए तो ख़ुद इन्हें माननेवाले ही घबरा जाते हैं। और आप घबरा ही गए। बात तो सिद्ध हो गयी। आप अपनी ही मान्यताओं को झुठला भी रहे हैं और उनका समर्थन भी कर रहे हैं।
      और मैं एक ही बात बार-बार नहीं दोहरा सकता। कृपया एक ही बार में समझ लें कि ये प्रश्न मैं ईश्वर से नहीं उसके स्वयंभू रक्षकों और वक़ीलों से कर रहा हूं। व्यंग्य की शुरुआत में ही लिखा है-
      ‘‘ पता नहीं कौन लोग रहें होंगे, कैसे लोग रहे होंगे जिन्होंने ईश्वर को बनाया। और बनाए रखने के लिए तरह-तरह की स्थापनाएं और दलीलें खड़ी कीं। मैं जब कभी इन तर्कों की ज़द में आ जाता हूं, मेरी हालत विचित्र हो जाती है। ईश्वरवालों का कहना है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है, वह सब कुछ देख रहा है। थोड़ी देर को मैं मान लूं कि यह बात सही है तो! होगा क्या ?’’
      मगर बात यहीं ख़त्म नहीं होती। अब आप इधर-उधर की बातें छोड़िए और असली सवाल पर आईए। आप यह बताईए कि आपको कैसे पता लगता है कि ईश्वर क्या पसंद करता है, क्या नापसंद करता है, कब-कब, क्या-क्या करता है, मांओं की कोख में बच्चों को नंगा देखता रहता है???? यह सब बताने के लिए ईश्वर कैसे आपसे संपर्क करता है-फ़ोन से, फ़ैक्स से, मोबाइल से, ईमेल से, आमने-सामने, सुबह के नाश्ते पर!!?? कैसे?? ऐसे नहीं चलेगाा। आपको प्रमाण देने पड़ेंगे। जब मैंने यह लेख लिखा तो क्या ईश्वर आपसे कहने आया कि संजय ग्रोवर का एक व्यंग्य आया है आप मेरी तरफ़ से जाके फ़लां तरह की भाषा में उसका जवाब दो। क्योंकि यह बातें तो रोज़ के अख़बार में भी नहीं आतीं तो उन क़िताबों में भी कहां आएंगीं जहां से आपने अपनी समझ में ईश्वर की पसंद-नापसंद की लिस्ट निकाल ली है! वैसे भी क़िताब की कोई प्रामाणिकता नहीं होती। दुनिया-भर में करोड़ों क़िताबें छपतीं हैं। आंख मूंदकर विश्वास करना बेवकूफ़ी है। तो बताईए कि ईश्वर आपके पास क्यों आएगा मेरे लेख का जवाब दिलवाने के लिए? क्या वह आपको ख़ुदसे ज़्यादा अक्लमंद मानता है!!? क्या आप भी ऐसा मानते हैं!!?? यह तो आपके अहंकार की तरफ़ एक इशारा है। क्या आप ईश्वर से बिना पूछे ही उसके बिहाफ़ पे काम करने निकल पड़ते हैं?? यह तो...क्या कहूं.....बिलकुल ही अच्छी बात नहीं है। या तो आप ख़ुदको ईश्वर से ऊपर मानकर बैठे हैं या फिर उसे....
      हम ईश्वर से द्वेष नहीं करते क्योंकि द्वेष उसीसे किया जा सकता है जिसका कोई अस्तित्व हो। आप ज़रुर ईश्वर से द्वेष करते हैं तभी उसे बिना बताए उसके काम अपने हाथ में ले लेते हैं। ज़ाहिर है ऐसे में उसे कुछ न कुछ नुकसान तो होता ही होगा। वैसे सच बताईए, आपको क्या सिर्फ़ अपने फ़ायदे से मतलब रहता है!? वरना उसके काम करते समय कभी उससे भी सलाह ले लिया करते!
      बहरहाल अब बात चल ही निकली है तो अब तो मैं आपसे जानके ही छोड़ूंगा कि आपको ईश्वर के रोज़ाना के काम-काज़, पसंद-नापसंद की डिटेल्स पता रहने का ज़रिया आखि़र क्या है!? मुझे यह आपसे सप्रमाण जानना है।
      और जब यह सिद्ध हो जाए कि आप ईश्वर के अधिकृत प्रवक्ता हैं तो यह ज़रुर बताईएगा कि जब दुनिया में बलात्कार और छेड़खानी हो रही होती है, ग़रीब बच्चे फ़ुटपाथ पर प्यास से मर रहे होते हैं और मंदिरों में करोड़ों टन सोना व्यर्थ पड़ा होता है, जब कोई नीचता के काम करने के बाद ख़ुदको ऊंचा घोषित कर रहा होता है(बहुत सी शंकाएं है, घीरे-धीरे निवारण कर दीजिएगा) तो उस वक्त ईश्वर क्या सोच रहा होता है, किधर बिज़ी होता है!!??
      और ये जो भाईसाहब आपकी जैजैकार कर रहे हैं इनसे कहिए कि ज़्यादा परिश्रम और कर्मठता वगैरह न दिखाएं, हम इनके एक-दो वाक्यों से समझ गए कि जो भी ईश्वर को मानता है वह इनके लिए महाविद्वान है, उसकी जिह्वा पर सरस्वती बैठी है, उसके जैसा ज्ञानी दुनिया में नहीं हुआ इत्यादि। एक ही बात बार-बार लिखना ज़रा भद्दा लगता है और लोगों को शक होने लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है।
      तो मैं आपके जवाबों का इंतज़ार कर रहा हूं, सप्रमाण..........

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    6. अजीब तो आपकी विचारधारा की विचारवायु है ग्रोवर जी!! क्योंकि आप अपने एकांगी दिमाग पर ही जडता से जमे हुए है और अपने दिमाग को ही दर्प पूर्वक निर्णायक मानते है,उस दिमाग के लिए पूर्व ज्ञान का कोई औचित्य नहीं है.अतः ऐसा कोई विचार नहीं हो सकता जिसे आपका दिमाग जडता पूर्वक या वक्रता पूर्वक मानने से इनकार न करे,अथवा स्वनिर्धारित सीमा से आगे हलन चलन करने से पहले अपने हाथ ही उंचे कर ले.

      यदि आपकी नास्तिक दृढ आस्था है कि "ईश्वर जैसा कुछ है ही नहीं" तो आपको क्या फर्क पडता है कि उसके उसके स्वयंभू रक्षक और वक़ील क्या कहते है? यदि आपकी मान्यता अटल है कि ईश्वर अत्याचार बलात्कार से बचाने आने वाला नहीं तो ईश्वर को खोज कर उसे दो सुनाने की बजाय स्वयं पुरूषार्थ व कर्मयोग क्यों नहीं करते, समाधान तो आपके पुरूषार्थ से भी हो जाएगा. बैठे बैठे ईश्वर की आलोचना सभा चलाने से भी आपको समाधान तो प्राप्त होना नहीं है.तो वो क्यों नहीं करते जिन विचार मूल्यों पर आपकी निष्ठा है.

      मेरा भी बार बार यही कहना है कि अब आप इधर-उधर की बातें छोड़िए और सवाल का असली मक़सद बताईए। ईश्वर के बारे में इतना कुछ क्यों जानना चाहते है? जब आप के लिए ईश्वर है ही नहीं तो वह किस विध अपनी व्यवस्था चलाता है जान कर क्या करोगे? या तो आप अपनी धारणा पर निष्ठावान नहीं है या फिर दुविधाग्रस्त है कि अगर ईश्वर हुआ तो क्या करोगे. आपकी स्थिति शायद त्रिशंकु जैसी है. मैं तो आपसे नहीं होने का प्रमाण भी नहीं मांग रहा....पर पता नहीं आपको उसके होने का क्यों प्रमाण चाहिए.

      वस्तुत: उसकी कार्यप्रणाली और सिस्टम का तार्किक और सुव्यवस्थित ज्ञान उपलब्ध है. मानव को विचारों, वाणी और कायिक कर्मों और पुरूषार्थ में स्वतंत्र रखा हुआ है इसी लिए आप अपनी तरह सोच सकते है, भला-बुरा बोल लिख सकते है, अच्छे बुरे कर्म कर सकते है. और इसी तरह मानव प्राय विचारों को वक्र बनाता रहता है. आपको इससे विशेष प्रमाण देना व्यर्थ है, आपके जानने का उद्देश्य ही नहीं पता, दुरूपयोग की सम्भावनाएँ ही प्रतीत होती है. व्यक्ति का उलटा लक्ष्य निर्धारित हो,अटल हो तो सीधे लक्ष्य की पूछ-ताछ संदिग्ध ही रहती है. इंसान हमेशा अपने से पूर्व के श्रुत व ज्ञान पर ही निर्भर होता है. आपको तो किताबों और ज्ञान से जन्म-जात बैर है. और सुनी सुनाई बातों को प्रमाणीत मानते है.कथनो के निम्न कक्षा के हास्यास्पद अर्थ लगाने तक ही चलता है. आपको शब्दार्थ तो फिर भी समझ आ जाते है किंतु भावार्थ और समीक्षायुक्त अनव्यार्थ ग्रहण करने का सामर्थ्य भी नहीं. इसलिए आप तो बस सुनी सुनाई बातों के सतही अर्थ निकाल कर व्यंग्य बनाने में ही व्यस्त रहिए. आपके समय का यथेष्ट उपयोग है.

      अहंकार की बात आप करते हो?...:) जिस दिमाग में विकार आने की असीम सम्भावनाएँ हो उस अपने दिमाग को ही सब से उपर मानना दूसरों के प्रदत्त ज्ञान (किताबों)से भी उपर....अहंकार और दम्भ तो इसे कहते है.

      @ हम ईश्वर से द्वेष नहीं करते क्योंकि द्वेष उसी से किया जा सकता है जिसका कोई अस्तित्व हो।

      तो फिर किसी की कार्य-प्रणाली के बारे में भी तभी पूछा जाता है जिसके अस्तित्व में होने का भान हो.(नास्तिकों की दुविधा कभी समझ नहीं आती)

      @ मैं आपसे जानके ही छोड़ूंगा कि आपको ईश्वर के रोज़ाना के काम-काज़, पसंद-नापसंद की डिटेल्स पता रहने का ज़रिया आखि़र क्या है!?

      बहुत दुष्कर है, आपके लिए तो महादुर्लभ. आप सतही-सोच से आगे का चिंतन कर ही नहीं सकते. इमानदारी से बताना तो चाहता हूँ पर ग्रहण पात्र में हजारों छेद है, टिकेगा नहीं. और फिर भी देने का प्रयास हुआ तो सार निकल जाएगा और पात्र में थोथे ही बचेंगे.... फिर आप जैसे लोगों को कहने का अवसर मिलेगा कि देखा! मैं न कहता था,वहां सार नहीं है ऐसे थोथे ही है.

      ठीक है प्रतुल जी से कह देता हूँ, संयम बरते, दूसरों की अत्यधिक प्रशंसा ईर्ष्यालूओं के लिए आग में घी का काम करती है. वेला-कुवेला, सभाजन परीक्षा,धैर्य आदि का ध्यान रखा जाना चाहिए

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    7. बात साफ़ ही है, आपके पास कहने को कुछ है ही नहीं।
      मैं ईश्वर के बारे में कुछ नहीं जानना चाहता। अगर ऐसा होता तो मैं आपके ब्लॉग पर, लेखों पर जाता। आप यहां आए हैं तो साफ़ ही है कि आप ही की कुछ समस्या है।
      मुझे व्यंग्य उन विषयों/मुद्दों पर लिखना ठीक लगता है जो आदमी की ज़िंदगी को सीधे प्रभावित करें ; आसमान-पाताल की काल्पनिक, प्रयोजनहीन गप्पों में मेरी कोई रुचि नहीं।
      धर्म के नाम पर गंदे रीति-रिवाजों, बेसिरपैर के कर्मकांडों, पाखण्डों के ज़रिए स्त्रियों, दलितों, मासूमों, नास्तिकों, चिंतकों का शोषण और उत्पीढ़न बंद हो, इसके लिए ईश्वर नाम की कल्पना पर चोट ज़रुरी है।
      उम्मीद है उक्त चार पंक्तियां समझ पा रहे होंगे। कोई जल्दी नहीं है, दस-पांच दिन लगा सकते हैं।
      यू तो सारी उम्र ही पड़ी है।

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    8. फिर तो लगे रहो, शायद कोई आपके टॉयलेटी व्यंग्यों से किसी आदमी की ज़िंदगी सीधे प्रभावित हो जाय... और इस तरह नास्तिकों, और एकांगी दिमाग चिंतकों का शोषण खत्म हो जाय....
      सप्रयोजन गप्पों में ही रुचि लीजिए....वैसे बताना जरा नास्तिकों भी शोषित है? यह शोषण कैसे होता है?
      आप सारी उम्र लगाते रहिए.... जो पहले जानने को उतावले थे और अब कुछ नहीं जानना चाहते.... हमारा काम तो पूरा हुआ, आपको कहने के लिए अब कुछ भी नहीं, क्यों कहें? आप लगे रहिए.....सप्रयोजन!!! मेरे लेखों पर आना ही मत, वहाँ जीवन मूल्यों का वह पाठ है जिसे आप जैसे लोग मुफ्त में फंसना मानते है. हमारी समस्या कुछ भी नहीं है, यह तो यहाँ ईश्वर के आभास मात्र से शर्माते लजाते भय खाते देखा तो सांत्वना के खातिर चले आए :)

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    9. जीवन-मूल्यों का पाठ तो पहले ही कमेंट में स्पष्ट था।
      ईश्वर के कामों को ज़बरदस्ती अपने हाथ में ले लेने के औचित्य के संदर्भ में कोई प्रमाण दे न सके, अब अपनी समस्या छुपाने के लिए सांत्वना देने का खुला झूठ!
      मुझे यही नहीं पता कि आप लिख भी सकते हैं, कोई ब्लॉग भी है, आने का तो सवाल ही कया है!?
      वैसे सप्रमाण आपके पास कोई उत्तर हो तो अभी भी मैं सुनने को तैयार हंू। कि ईश्वर किस जरिए से आपको अपनी पसंद, नापसंद, लोगों को मां के पेट में नंगा देखने, उसके बिहाफ़ पर लोगों को समझाने आदि के बारे में बताता है। आपकी बात-चीत कौन-से आसमान में होती है। सब सुनूंगा बशर्त्ते कि प्रमाण हो...
      प्रमाण तो समझते हैं न !

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  20. ईश्वरीय वाणी, सरस्वती का जिह्वा पर बैठना मैंने आज सुज्ञ जी द्वारा दिए तर्कों में दिख लिया। आनंद ... परमानंद!!! .......... 'निरामिष' विषय के बाद आध्यात्म पर ऐसा चिंतन आज से पहले आनंद की विषयवस्तु नहीं बन पाया था। इस पूरे सत्संग का श्रेय श्रीमान कथित 'नास्तिक' को ही देना चाहूँगा। :)



    वैसे मैं जानता हूँ 'संजय ग्रोवर' नाम का संसार में कोई नास्तिक व्यक्ति नहीं है। यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ। यदि है तो वह मेरा कुछ बिगाड़कर दिखाए। :)

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    @ प्रीति स्नेह जी,

    जब आप यह कहती हैं कि "पर ये यकीं से कह सकती हूँ की कुछ ऐसे अनुभव मुझे तो हुए हैं जो इस मस्तिष्क की पकड़ से परे हैं , विज्ञानं के तर्क से परे हैं .जिससे ये लगता है की कुछ है जो अज्ञात है. क्यूँ कैसे पता नहीं जैसे की आत्मा soul का अस्तित्व है जिसका वैज्ञानिक भी अनुमोदन करते हैं अपने परिक्षण के बाद."

    तो इतना कहना तो बनता ही है कि वह अनुभव यहाँ शेयर करें... दूसरा यह कि अब तक की मेरी जानकारी में आत्मा के अस्तित्व का अनुमोदन किसी वैज्ञानिक संस्था ने नहीं किया... यदि आपके पास कोई जानकारी है तो यहाँ उसका लिंक दें...

    निश्चित तौर पर आज का विज्ञान बहुत सी चीजों के बारे में नहीं जानता है... बहुत कुछ है जो हमें आज अज्ञात है... पर इससे यह नहीं साबित होता कि ईश्वर है... इससे सिर्फ और सिर्फ यही साबित होता है कि अभी बहुत कुछ बाकी है मानव मस्तिष्क को एक्सप्लोर करने के लिये... अब कुछ चीजें विज्ञान ने अकाट्य रूप से साबित कर दी हैं जैसे चाँद कोई देवता नहीं, न किसी की सुनने और उसे कुछ लेने-देने की क्षमता रखता है... :)


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    सबसे पहले तो प्रतुल जी से यह अनुरोध कि यहाँ एक बहस हो रही है इसलिये कृपया जयकारे न लगाये जायें... कीर्तन और बहस का फर्क जानिये मित्र...

    अब दूसरी बात...

    'वह' डेढ़-ढाई हजार साल से पहले तो बाकायदा आकाशवाणियाँ करता था, संदेशवाहक भेजता था और ग्रंथ रचता/रचवाता था... जिन ग्रंथों पर आज भी लोग बलिहारी हुऐ जाते हैं... पर आज जब इंसान के पास क्षमता है कि उसकी आवाज और मौजूदगी रिकॉर्ड कर सके तो उसने यह सब करना बंद कर दिया...

    वो कैसा है जो यह चाहता है कि उसके नाम पर कोई घिसा-पिटा वाक्य दिन में कई कई बार दोहराओ, खाने-पीने का सामान आग में फूंको, कुछ खास जगहों पर जहाँ वो ज्यादा सुनता है जाकर या तो माथा झुकाओ, घंटा बजाओ या सुगंधित धुआँ-आग थाली में लगा उसके सामने घुमाओ, या फिर उसका ध्यान करो तो वह खुश हो जायेगा...

    मैंने एक बार 'समय अविराम' जी के हवाले से यह लिखा भी था कि कोई केवल आज के दौर में पैदा हो जाने से ही आज का इंसान नहीं हो जाता... यह भी हो सकता है कि समझ और विवेक के स्तर पर वह आज भी गुफाओं में वास कर रहा हो... और कई गुफावासियों को पूरा जीवन भी कम पड़ेगा, आज के दौर के इंसान की बातें/धारणायें समझ पाने में...



    ...

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    1. @प्रवीण
      वो कैसा है जो यह चाहता है कि उसके नाम पर कोई घिसा-पिटा वाक्य दिन में कई कई बार दोहराओ, खाने-पीने का सामान आग में फूंको, कुछ खास जगहों पर जहाँ वो ज्यादा सुनता है जाकर या तो माथा झुकाओ, घंटा बजाओ या सुगंधित धुआँ-आग थाली में लगा उसके सामने घुमाओ, या फिर उसका ध्यान करो तो वह खुश हो जायेगा...


      मुझे तो नहीं लगता की ईश्वर को यह सब करवाने की आवश्यकता या इच्छा होती है, हां यह ज़रूर है कि जिसे उससे से इश्क है वोह उसे सोते-जागते याद करने में लुत्फ़-अन्दोज़ होता है। और फिर अगर मुझसे जिसे इश्क हो, मैं उससे मिलन के आनंद में वशीभूत होकर उसके ध्यान में बैठता हूँ, तो क्या वह मुझसे खुश नहीं होगा???

      प्रवीण भाई, इश्क की अजीब ही लीला होती है,... किसी शायर ने कहा है कि "इश्क़ कीजे फिर समझिए आशिक़ी क्या चीज़ है".

      आप आस्था को अंध-भक्ति समझते हैं और मैं आशिक़ी!

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    2. @सबसे पहले तो प्रतुल जी से यह अनुरोध कि यहाँ एक बहस हो रही है इसलिये कृपया जयकारे न लगाये जायें... कीर्तन और बहस का फर्क जानिये मित्र...

      प्रिय मित्र प्रवीण,
      अब क्या प्रतुल जी को चर्चा पर अपने विचार अभिव्यक्त करने हेतु शब्दावली का चयन भी आपके हिसाब से करना पड़ेगा ????? आश्चर्य !!!!

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  23. धन्यवाद प्रवीन जी, बहुत दिनों के बाद ब्लॉगजगत में झाँक रहा था... आपके लिंक ने एकदम से कहा पहुंचा दिया! पहले एक शांतचित से लिखा हुआ विशुद्ध तार्किक और निर्णायक लेख फिर उस पर विस्तारवादी टिप्पणिया..... वाह! प्रतुल जी ने सही तो कहा है.... एक तरह से सत्संग सा हो गया... अब उस परमात्मा(जिसे हर कोई नहीं मानता,या नहीं मानना चाहता,या नहीं मान पाता ) का चिंतन हो रहा हो तो सत्संग तो हो ही जाता है!
    वैसे तो कहते है कि इश्वर वितंडावाद का विषय नहीं है पर एक सार्थक चर्चा तो की ही जा सकती है!
    और इस व्यंग्यशाला में प्रतुल जी ने भी अपनी निर्विवाद उपस्थिति दर्ज करवा ही दी है! अब पता नहीं प्रतुल जी का कुछ बिगड़ा है या नहीं.... कुछ पता नहीं चल पाया!

    कुंवर जी,

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  24. कुछ ऐसे रहस्‍य जो विज्ञान के तर्क से परे हैं ... से अक्‍सर जीवन में रूबरू होने के बाद यह तो कहा ही जा सकता है कि ... कोई अदृश्‍य रहस्‍य भी प्रकृति में विद्यमान है .. पर जबतक उसके बारे में पूरा खुलासा नहीं हो पाता ... किसी भी पक्ष को बहस करने का कोई मतलब नहीं ... इस मामले में पूर्वजों की बातों को मान लेना बेहतर है .. वैज्ञानिक खोजें भी परिकल्‍पना पर ही आधारित होती है ...

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    1. वैज्ञानिक खोजे प्रमाण पर आधारित होती है मैडम और अगर विज्ञानं की पहुच से कुछ रहस्य दूर है तो उससे ईश्वर काअस्तित्व कैसे साबित होता है.

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  25. नास्तिक क्या होता है. इस दुनिया मे कोई नास्तिक नही. ये ब्लाग का शीर्षक फिजूल है.
    बाकी मुद्दा व्यक्तिगत है. जिसे ईश्वर का अस्तित्व मानना है माने न मानना हो न माने कोई फांसी थोडे ही है. कोई भी व्यक्ति अविश्वासी कैसे हो सकता है? रोटी दाल के चर्चे कीजिये. कहा पडे है... नेति नेति

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  26. अब 'ईश्वर सब देख रहा है' जैसी बात का क्या मतलब है ये तो सब जानते हैं आस्तिक भी और नास्तिक भी।इसका अर्थ आपके कर्मों का लेखा जोखा ईश्वर रखता है।मनुष्य को बुरे कर्मों से दूर रहने को कहा गया है या डराया गया है।जो बात आप खुद समझ गए है उस पर तर्क क्यों कर रहे हैं(अब इस पर भी कोई व्यंग्य निकल आए तो मुझे आश्चर्य न होगा जैसे कि बड़े अन्तर्यामी है आप जो जान गये कि संजय जी को इस पंक्ति का मतलब समझ आ गया आदि)।तो ये तो जागकर भी सोने का नाटक करने वाली बात हुई।पाठक जी को आपने कहा दिमाग निकलवा क्यों नहीं देते।क्या आप ये कहना चाहते थे कि दिमाग का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए यदि किताबों में सारा ज्ञान है तो?एक गाना है सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था... तो क्या उस हिरोइन कि उम्र सौ साल से ज्यादा है?प्यार की गहराई बताने का वो तरीका है।हाँ इस पर बहस हो तो फायदा भी कि यदि व्यक्ति इतना समझदार है तो उसे ईश्वर के नाम पर डराने की क्या जरूरत वैसे ही उचित अनुचित का भेद समझाया जा सकता है।तब कई बातें दोनों तरफ से सामने आएँगी।वैसे समझाने और डराने में फर्क तो होता है।वैसे आपको बता दूँ कि मैं भी नास्तिक ही हूँ।

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    1. अजीब बात है राजन जी, कहीं यह डिटेल्स तो दे नहीं रखीं कि ईश्वर किस टाइप के कर्मों का लेखा-जोखा रखता है! आदमी टॉयलेट और बाथरुम में भी तो पाप-पुण्य करता है। कि नहीं!? आदमी ने क्या तय कर रखा है कि मंडे को ड्राइंग रुम में पुण्य करुंगा, ट्यूज़डे को स्टोर रुम में पाप करुंगा! बेचारे शायर साहब का तो शे‘र ही बेकार हो गया-
      साक़ी शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर,
      या वो जगह बता दे जहां पर ख़ुदा नहीं!
      ‘दिमाग़ निकाल दीजिए’ मतलब खीज में कहा है कि भाई होमवर्क घर में ही करके आओ। मैदान में आके ‘तूने यह क़िताब पढ़ी कि नहीं’, ‘मैंने अल्लम क़िताब तीन बार घोंटी’ करने का क्या मतलब!? एक बार आप रेस में खड़े हो गए, रैफ्री ने सीटी मार दी, अब आप प्रतिस्पर्द्धी से कहें कि ‘भाई मैं तो रात को सो नहीं पाया’, ‘तुमने तो दौड़ पर मिल्ख़ासिंह की क़िताब पड़ी होगी’ करने का क्या मतलब है? मैदान में आके तो दौड़ना है, उससे पहले कौन क्या कर रहा था, इसे दौड़ के रिज़ल्ट में नहीं जोड़ा जाता।
      आप नास्तिक नहीं भी हो तो मैं आपको खा नहीं जाऊंगा, मैं कोई सो-कॉल्ड धार्मिक थोड़े ही हूं।

      और कहीं किसी नए विषय पर व्यंग्य निकल भी आएगा तो उसमें डरना क्या!? नेताओं पर व्यंग्य लिख-लिखकर हम कब तक अपनी कमियां ढंकते रहेंगे!?

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    2. राजन जी, आपने सब कुछ स्पष्ट कर दिया.....

      "यदि व्यक्ति इतना समझदार है तो उसे ईश्वर के नाम पर डराने की क्या जरूरत"

      और वाकई यदि मनुष्य की सोच परफेक्ट हो और दिमाग व्यवस्थित तो उसे ईश्वर के नाम पाखण्ड या अंधविश्वास से कैसा भय? लेकिन नहीं यह तो दूसरे के फटे में टांग अडाने जैसा है. क्या उसके दिमाग में नीर-क्षीर समझने का विवेक नहीं है.परिपक्व दिमाग को तो सब कुछ समझ आ जाता है.

      वैसे मैं भी नास्तिक ही हूँ। लेकिन धर्म, कर्म का सिद्धांत, आत्मा के अस्तित्व में मानता हूँ. मैं इन नास्तिकों की तरह कृतघ्न कैसे हो सकता हूं क्योंकि इन सबका मनुष्य जीवन को अमूल्य योगदान भी है. धर्म-कर्म-ईश्वर से जडभरत की तरह मात्र द्वेष करके जलते ही रहें और विद्वेष प्रतिशोध में दुष्कर्म फैलाएं...मात्र अपने को सही साबित करने के कुकृत्य में दोषी क्यों बनें. यदपि जो कुछ भी गलत है, रूढ है उसकी अवहेलना करें, तथापि वितंडा क्यों करें? हमारे जीवन में जो भी सदाचार प्रेरणा का उपकार है उसके प्रति अहसानमंद होना, कृतज्ञ होना सज्जनता है.

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    3. ये बातें कही ही जाती है बुरे कर्मों के संदर्भ में ही और ये कहीं भी किए जाएँ बुरे ही कहलाएँगे।जानकारी का स्त्रोत जो भी हो पर कौनसे कर्म सामाजिक रूप से बुरे हैं मोटा मोटा ये जरूर सभी को पता है।टॉयलेट में जा नित्यकर्म करने को तो किसी समाज या धर्म ने बुरा नहीं कहा।जो समाज शराब को बुरा मानेगा वह इसके खिलाफ इश्वर धर्म आदि का प्रयोग करेगा।हाँ तमाम अपराध फिर भी उस समाज में हो सकते हैं पर यदि कोई रुक गया तो आपको बताएगा नहीं कि संजय भाई कल रेप करने का मूड हो रहा था पर ईश्वर के ख्याल ने रोक लिया।दिमाग निकालने वाली बात सबको समझ आई पर कोई आपके शब्दों को पकड़ कर ये पूछे कि क्या बेवकूफी है दिमाग निकलने पर इंसान जीवित कैसे रहेगा तो ऐसी तार्किकता को आप क्या कहेंगे?पर माने न माने इस लेख के माध्यम से आप भी कुछ यही कर रहे है।पहले मैं भी यही सोचता था कि किसी आस्तिक से बहस हुई तो ऐसे ही तर्क करूँगा पर कभी किए नहीं क्योंकि सिर्फ बात काटू चतुराई दिखाने से ज्यादा महत्तव ये जानने का है कि ईश्वर आत्मा आदि की परिकल्पना कितनी जरूरी है और कितनी नहीं।

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    4. आप किसी आस्तिक से बहस कैसे करेंगे मुझे नहीं मालूम, क्योंकि आपकी बातों में नास्तिकता और तार्किकता मुझे तो कहीं दिखाई नहीं दे रही (सोने पर सुहागा यह कि आपके प्राकृतिक सहयोगी श्री सुज्ञ ने भी ठीक आपके नीचे कह दिया है कि मैं भी नास्तिक हूं) वरना आपने सोचा होता कि अगर ईश्वर है तो उसने किसी आदमी के मन में रेप का ख़्याल ही क्यों आने दिया!? यही फ़र्क है मौलिक चिंतन और चतुराई में। यही अंतर है अर्जित किए चिंतन में और उधार के थोथे ज्ञान में।
      वैसे अब लोग ख़ूब समझने लगे हैं कि कौन लोग थे जो तरह-तरह के रुप बनाकर हर मेले से माल बटोरते रहे।

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    5. संजय जी,दूसरी टिप्पणी में मैंने कहा कि संभव है कोई आस्तिक ईश्वर के भय से रेप नहीं करता हो।इससे आपने मान लिया कि मैं भी ईश्वर में विश्वास करता हूँ?आप तार्किकता आदि की बात कर रहे हैं जरा बताइए किस तर्कशास्त्र से बातों के ऐसे अर्थ निकाले जाते हैं?ये बात आप खुद कह रहे है कि ईश्वर धर्म आदि के नाम पर कमजोरों का शोषण किया जाता है।क्या आप मानते है कि कोई नास्तिक आपकी इस बात से असहमत नहीं हो सकता कि ईश्वर की कल्पना सिर्फ इसीलिए की गई होगी कि वह शोषण का हथियार बन जाए या इससे सिर्फ नुकसान ही हुआ है?तो मैंने यही किया था अब यह चिंतन आपको पिछड़ा लग सकता है लेकिन मैं ऐसा ही सोचता हूँ।सुज्ञ जी ने क्यों समर्थन किया ये उन पर छोडिये आप बेहतर जानते होंगे कि दो व्यक्ति किसी एक बात पर सहमत है तो जरूरी नहीं कि बाकि पर भी सहमत होंगे ही।ये नास्तिकों का ब्लॉग है।आप सभी सदस्यों में भी मतभिन्नता फिर भी होती होगी।ऐसे ही किसी गलत बात पर असहमति नहीं जताई तो इसका अर्थ ये नहीं होता कि हम उससे सहमत हैं।

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    6. सवाल असहमति का नहीं है। असहमति तो प्रवीनजी और मेरी भी है, इसी पोस्ट में है, सुज्ञ जी को जवाब देने और न देने को लेकर। पर उनकी बात समझ में आती है, आपकी नहीं आती। आप ढंके-छुपे शब्दों में कहना चाह रहे हैं कि ईश्वर की वजह से कई बुरे काम रुक जाते है। मगर मुझे ऐसे उदाहरण याद नहीं आते जबकि रोज़ाना देखता हूं कि सारे क़ानून तोड़नेवाले, देश को नुकसान पहुंचानेवाले, बलात्कारी और छेड़नेवाले, ज़मीनों पर नाजायज़ कब्ज़े करनेवाले.......सब किसी न किसी ईश्वर को मानने वाले होते हैं। दूसरा एक तथ्य भी आए दिन साफ़ देखता हूं कि ईश्वर के नाम पर कुछ लोग ख़ुद को ऊंचा बताकर, ख़ुदको उसकी दूत बताकर धंधे कर रहे हैं। तीसरा तथ्य और साफ़ है कि ईश्वर के नाम पर जो धर्म बने और जो रीति-रिवाज, प्रथाएं, कर्मकांड, अंधविश्वास आदि बने वे स्त्रियों, कथित नीची जातियों, ग़रीबों, मौलिक चिंतकों, नास्तिकों के गले की फ़ांस बन गए। इसलिए यह सोचना कि धर्म और ईश्वर भले ही झूठ हों पर आदमी को पाप से रोक रहे हैं, अंततः ग़लत साबित हुआ। सारी दुनिया आतंकवाद, युद्ध, नस्लवाद और न जाने किन-किन ख़ब्तों की वजह से धू-धू करके जल रही हैं और जो धर्म इस सब की जड़ है, उसी में हम समाधान ढूंढ रहे हैं!!!
      फिर आप मुझे बातकाटू बता रहे हैं और तर्क दे रहे हैं ‘सौ साल पहले’ वाले गाने का! पहले तो आपको बताना चाहिए कि ऐसा तर्क मैंने कहां दिया है? मैं तो ऐसी भावुक कविताओं को भी नुकसानदेह मानता हूं समाज के लिए जिनमें सारी बातें घुमा-फिराकर, बढ़ा-चढ़ाकर कहीं जातीं हैं। इससे होता यह है कि लोग मुहावरों में कही बातों का अपनी-अपनी बुद्धि के हिसाब से अर्थ निकाल लेते हैं और मूल मंतव्य कहीं खो जाता है। फिर कवि महाराज का देहांत हो चुका हो तो बताने वाला भी कोई नहीं रह जाता।
      यह आपका सोचना है कि ‘सब जानते हैं कि ‘ईश्वर सब देख रहा है’ का क्या मतलब है! मैं पूरी तरह असहमत हूं। जो बातें कहीं स्पष्ट कही ही नहीं गयीं, उन्हें सब जान भी कैसे सकते हैं!? और लोगों के व्यवहार से तो बिलकुल ही स्पष्ट है कि सब तो क्या दो-चार भी जानते हों तो बड़ी बात है। पहले तो पाप-पुण्य तय करना ही मुश्क़िल है। किसी ठंडे देश में शराब पीने को चाय पीने की तरह लिया जाता है तो भारत में इसे अनैतिक कहा जाता है। एक आदमी अरेंज्ड मैरिज को पवित्र मानता है दूसरा आदमी इसे ज़बरदस्ती या बलात्कार मानता है तीसरे की कोई और भी राय हो सकती है। ऐसे में आप इतनी आसानी से बातों को तय कर देना चाहते हैं। यह आपकी राय है कि टायलेट, बाथरुम मे पाप-पुण्य नहीं हो सकते। मेरा तजुर्बा तो यह है हममें से कई बच्चे ऐसे थे कि जिन कामों को घर के दूसरे हिस्सों में करने में डर लगता था उनके लिए हम टायलेट, बाथरुम चुनते थे। आज वे काम हमें सामान्य लगते हैं मगर उस वक्त हमें बताया गया था कि यह बहुत बुरी बात है या पाप है-जैसेकि कोई चिट्ठी पढ़ना, कोई कामुक तस्वीर देखना, जासूसी उपन्यास पढ़ना.....
      दिमाग़ निकलवा देने की बात मैंने खीज में मुहावरे की तरह कही। आप कह रहे हैं कि फिर आदमी मर नहीं जाएगा। ठीक है, आप अर्थ निकाल सकते हैं, मुहावरों के साथ यह दिक्कत है। शुक्र है, आपने यह नहीं कहा कि आप तो सबका दिमाग़ निकाल कर उसे भूनकर खाना चाहते हैं, आप आदमखोर हैं, आप हत्यारे हैं। वैसे आपके पहले निष्कर्ष के मैं समर्थन में हूं, आदमी दिमाग़ निकालने से मर भी सकता है। वैसे अगर दिमाग़ शरीर के भीतर भी रहे मगर आदमी उसका इस्तेमाल न करे तो भी तो यह एक तरह से मरे-मरे जीना ही है।

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    7. आप कह रहे हैं कि मेरी बात आपको समझ नहीं आ रही और फिर बता भी रहे हैं कि मैं क्या कहना चाहता हूँ और उन पर राय भी बनाते आ रहे हैं।आपने आधी से ज्यादा पोस्ट मेरी उन बातों का जवाब देने में लगा दी जो वास्तव में मैंने कही ही नहीं है।और वहाँ तो कोई दबे ढके शब्दों का प्रयोग भी नहीं था।आपने कहा कि मैंने आपके दिमाग निकालने वाले मुहावरे का मतलब निकाल लिया।अरे सर जी मैंने मतलब नहीं निकाला बल्कि पूछा था कि यदि कोई केवल शब्दों को पकड़ कर संदर्भ पर ध्यान दिए बिना ऐसा मतलब निकाले तो उसे आप क्या कहेंगे।जैसा कि ईश्वर वाली पंक्ति का आप पोस्टमार्टम कर रहे हैं।यह बात एक खास संदर्भ में कही जाती है मुझे नहीं लगता कोई आस्तिक इसको लेकर कनफ्यूज होगा वैसे ही जैसे सौ साल वाले गाने के बारे में ये किसीने नहीं कहा कि यह कैसे संभव है।ऐसे ही मैंने ये कहीं नहीं कहा कि टायलेट में पाप नहीं हो सकते बल्कि ये कहा है कि समाज या धर्म जिन्हें बुरे कर्म कहता है वो कहीं भी हो बुरे ही रहेंगे।इन बुरे कर्मो के अलावा आस्तिक जो काम टायलेट मे कर रहा है उस समय उसे ईश्वर का ध्यान क्यो आएगा?डाक्टर द्वारा बताए परहेज का ध्यान खाने के समय ही आता है न कि हर बात में।

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    9. बाकी आपने बिल्कुल सही कहा कि पाप पुण्य को लेकर हर व्यक्ति की अपनी सोच होती है यही तो मैंने ऊपर सवाल किया कि व्यक्ति यदि इतना ही विवेकवान है तो ईश्वर का डर दिखाने की जरूरत ही क्या है।पर मान लीजिए ईश्वर या धर्म को हटा भी दिया जाए तब भी अच्छे बुरे में कोई तो भेद करना होगा जो सब पर लागू हो।बच्चों को इस बारे में तब परिवार या स्कूल कुछ तो सिखाएंगे?कई बार होता ये है कि व्यक्ति अपनी रुचि के काम तो करता रहता है पर उन्हें पाप या धर्मविरुद्ध मानता है जिनसे कीसीकि हानि हो।अश्लील साहित्य पढ़ने और छेडछाड करने में यही अंतर है।कई लोग ऐसे देखें है जिनमें सिर्फ धार्मिक होने की वजह से कोई बुराई नहीं है।हिंसा माँसाहार आदि को लेकर अपने धार्मिक विचारो की वजह से बहुत संवेदनशील है धर्म के नाम पर उन्हे ठगा या बरगलाया नहीं जा सकता। इसका मतलब ये नहीं कि मैं धर्म में कोई समाधान ढूँढ रहा हूँ वहाँ बस एक संभावना जताई थी।बल्कि मुझे तो लगता है नास्तिक होना कहीं अधिक सहज हो जाना है और यदि कोई सिर्फ ईश्वर या कानून आदि के 'डर' से अपराध नहीं कर रहा तो यह भी कोई बहुत प्रशंसनीय बात तो नहीं है।

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    10. जनाब, अर्थ तो शब्दों में से ही निकाले जाते हैं क्योंकि वाक्य भी उन्हींसे बनते हैं। आप प्रोफ़ाइल पिक्चर्स से अर्थ निकालते होंगे।

      अगर ईश्वर का ध्यान बुरे काम करते समय ही आता तो पाप बहुत कम हो जाता। फिर कोई कुंभ नहाने क्यों जाता ? कोई चढ़ावा चढ़ाने क्यों जाता ? कोई हत्यारे को हत्या का ख़्याल टॉयलेट, बाथरुम या किचेन देखकर आता होगा? ध्यान रखें ईश्वर ख़्याल भी देख सकता है। और ईश्वर क्या ऐन टाइम पर वहां पहुंचेगा जब पाप शुरु हो रहा होगा? नहीं उसको सब जगह मौजूद रहना है, हर जगह, हर वक्त, अपने भक्तों की बताई-फैलाई मान्यताओं के अनुसार। और अगर उसे ऐन टाइम पर ही आना है तो उसे बुरे ख़्याल से पहले आकर बुरे ख़्याल को ही रोक देना चाहिए। झंझट ही ख़त्म।

      अब आप सभी आस्तिकों का और सभी गीतप्रेमियों का ठेका ले रहे हैं-

      **यह बात एक खास संदर्भ में कही जाती है मुझे नहीं लगता कोई आस्तिक इसको लेकर कनफ्यूज होगा वैसे ही जैसे सौ साल वाले गाने के बारे में**

      आपको कैसे, क्यों लगता है कि यह बात एक ख़ास संदर्भ में कही जाती है!? मुझे तो बिलकुल नहीं लगता। आपकी इन पंक्तिओं से और अगले कमेंट की कुछ पंक्तियों में फिर वही कोशिश है जिन्हें आपने कहा कि मैं ढंके शब्दों में कहा बता रहा हूं-

      **पर मान लीजिए ईश्वर या धर्म को हटा भी दिया जाए तब भी अच्छे बुरे में कोई तो भेद करना होगा जो सब पर लागू हो।**

      **कई लोग ऐसे देखें है जिनमें सिर्फ धार्मिक होने की वजह से कोई बुराई नहीं है।हिंसा माँसाहार आदि को लेकर अपने धार्मिक विचारो की वजह से बहुत संवेदनशील है धर्म के नाम पर उन्हे ठगा या बरगलाया नहीं जा सकता। इसका मतलब ये नहीं कि मैं धर्म में कोई समाधान ढूँढ रहा हूँ वहाँ बस एक संभावना जताई थी।**
      एक तरह के लोग आपने देखे हैं तो दूसरी तरह के मैंने देखे हैं। उसके अलावा ऐसे लोग भी हैं जो मांसाहार नहीं करते पर आदमी को काट डालते हैं। ऐसे महान लोग भी होते हैं जो शरीर से कोई हिंसा नहीं करते पर अपनी सभ्य दिखती चालबाज़ियों से दूसरों को पागल कर डालते हैं।
      अब वक्त बदल चुका है हमारे पास शिक्षा है, मनोविज्ञान है, संविधान है, नैतिक शिक्षा है, यौन शिक्षा है.......धर्म इनके आगे बहुत छोटा और अर्थहीन हो चुका है।

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  27. बात साफ़ ही है, आपके पास कहने को कुछ है ही नहीं।
    मैं ईश्वर के बारे में कुछ नहीं जानना चाहता। अगर ऐसा होता तो मैं आपके ब्लॉग पर, लेखों पर जाता। आप यहां आए हैं तो साफ़ ही है कि आप ही की कुछ समस्या है।
    मुझे व्यंग्य उन विषयों/मुद्दों पर लिखना ठीक लगता है जो आदमी की ज़िंदगी को सीधे प्रभावित करें ; आसमान-पाताल की काल्पनिक, प्रयोजनहीन गप्पों में मेरी कोई रुचि नहीं।
    धर्म के नाम पर गंदे रीति-रिवाजों, बेसिरपैर के कर्मकांडों, पाखण्डों के ज़रिए स्त्रियों, दलितों, मासूमों, नास्तिकों, चिंतकों का शोषण और उत्पीढ़न बंद हो, इसके लिए ईश्वर नाम की कल्पना पर चोट ज़रुरी है।
    उम्मीद है उक्त चार पंक्तियां समझ पा रहे होंगे। कोई जल्दी नहीं है, दस-पांच दिन लगा सकते हैं।
    यू ंतो सारी उम्र ही पड़ी है।

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  28. फिर तो लगे रहो, शायद कोई आपके टॉयलेटी व्यंग्यों से किसी आदमी की ज़िंदगी सीधे प्रभावित हो जाय... और इस तरह नास्तिकों, और एकांगी दिमाग चिंतकों का शोषण खत्म हो जाय....
    सप्रयोजन गप्पों में ही रुचि लीजिए....वैसे बताना जरा नास्तिकों भी शोषित है? यह शोषण कैसे होता है?
    आप सारी उम्र लगाते रहिए.... जो पहले जानने को उतावले थे और अब कुछ नहीं जानना चाहते.... हमारा काम तो पूरा हुआ, आपको कहने के लिए अब कुछ भी नहीं, क्यों कहें? आप लगे रहिए.....सप्रयोजन!!! मेरे लेखों पर आना ही मत, वहाँ जीवन मूल्यों का वह पाठ है जिसे आप जैसे लोग मुफ्त में फंसना मानते है. हमारी समस्या कुछ भी नहीं है, यह तो यहाँ ईश्वर के आभास मात्र से शर्माते लजाते भय खाते देखा तो सांत्वना के खातिर चले आए :)

    इन पंक्तियों के साथ, अब नास्तिकों का उत्पीडन बंद करते है, ।।इति।।

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  29. जीवन-मूल्यों का पाठ तो पहले ही कमेंट में स्पष्ट था।
    ईश्वर के कामों को ज़बरदस्ती अपने हाथ में ले लेने के औचित्य के संदर्भ में कोई प्रमाण दे न सके, अब अपनी समस्या छुपाने के लिए सांत्वना देने का खुला झूठ!
    मुझे यही नहीं पता कि आप लिख भी सकते हैं, कोई ब्लॉग भी है, आने का तो सवाल ही कया है!?
    वैसे सप्रमाण आपके पास कोई उत्तर हो तो अभी भी मैं सुनने को तैयार हंू। कि ईश्वर किस जरिए से आपको अपनी पसंद, नापसंद, लोगों को मां के पेट में नंगा देखने, उसके बिहाफ़ पर लोगों को समझाने आदि के बारे में बताता है। आपकी बात-चीत कौन-से आसमान में होती है। सब सुनूंगा बशर्त्ते कि प्रमाण हो...
    प्रमाण तो समझते हैं न !

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  30. प्रमाण तो आप समझते ही है, कोई संदेह ही नहीं है इस बात में तो.....

    वैसे आपने अपना डी एन ए का प्रमाणपत्र तो ले ही लिया होगा...

    कुँवर जी,

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    1. डी एन ए का प्रमाणपत्र वे लें जो वंश, परंपरा, ख़ानदान आदि में विश्वास करते हैं। आप रखते हैं तो आप ज़रुर ले लीजिए।

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    2. खानदान,वंश परम्परा में भी विश्वाश नहीं.... ये नास्तिकता है या फिर... चलो जो कुछ भी है,
      अब हम तो मान लेते है जी, जो माँ-बाप ने बताया बिना प्रमाण के ही मान लिया,पर जो बिना प्रमाण नहीं मानते उनके बच्चे यदि उनसे एक कदम आगे निकले और अपने माँ-बाप पर प्र्शनचिन्ह लगाये तो वो उन्हें क्या प्रमाण दिखाएँगे कि वो ही उनके माँ-बाप है!
      और कोई बात है जो आप बताना चाहेंगे जो कि आपने बिना प्रमाण के ही मान राखी है आज तक और जिसका आप कभी विरोध नहीं करना चाहेंगे! जैसे आप खुले मन से खुले विचार प्रस्तुत करते है उस आधार पर इस बात पर मै आपसे इमानदारी से जवाब देने की आशा तो कर सकता हूँ!

      कुँवर जी,

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    3. अपने मां-बाप को मैं सुबह-शाम अपनी अपनी आंखों के सामने सालों तक देखता था। मैं उन्हें छू सकता था, उनसे लड़ सकता था, प्रेम कर सकता था, नफ़रत कर सकता था। वे भी मेरे साथ सब कुछ कर सकते थ। वे कोई अदृश्य भूत या ग़ायब भगवान या कहानियों में वर्णित पात्र थोड़े ही थे कि मैं उनके होने के प्रमाण इकट्ठा करता फिरता।
      यह सवाल तो अब आप पर आ गया महाशय। आप ख़ानदान, वंश वगैरह में जान देने की हद तक विश्वास करते मालूम होते हैं। इसलिए डी एन ए टैस्ट अब आपके और आपसे संबंधित लोगों के लिए ज़रुरी हो गया। आप यह टैस्ट कराएं और फिर जो भी रिज़ल्ट आएं उनके अनुसार ख़ुदको व्यवस्थित करें। इस ब्लॉग पर भी रिज़ल्ट डाल देंगे तो कईयों का भला होगा। आपको इस संदर्भ में ईमानदार भी मान लिया जाएगा और ख़ानदान और वंश में विश्वास रखने वाला प्रामाणिक वीर भी माना जाएगा क्योंकि बिना प्रमाणपत्र के ख़ुदको ख़ानदानी कहना एक तरह का फ्रॉड है।? मेरी समझ में ऐसे सभी लोगों को कब्रें खोद-खोदके, हड्डियां ढूंढ-ढूंढके सभी पीढ़ियों का डी एन ए टैस्ट कराना चाहिए।
      कई फ़ायदे होंगे, देर न करें।

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    4. कुंवरजी इश्वर के समर्थन के लिए इससे बुरा तर्क कोई हो ही नहीं सकता था कि अब आप लेखक के मां बाप पर सवाल उठाकर व्यक्तिगत हमला करने लगे. आपने मां बाप को तो हम रोज़ देखते है बात करते है पर आपका इश्वर भी तो कभी सामने आये.

      आस्तिको के तर्क इतने निम्न स्तर पर भी जा सकते है अंदाजा नहीं था.

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  31. मैंने तो अपनी चर्चा की इति कर दी थी लेकिन पुनः पुनः पैंदा बदल देते हो.... पहले कहा "कुछ नहीं जानना चाहता" अब शर्तों के साथ सुनने को तैयार हो बैठे हो... भई हम क्यों सुनाएं, जानने सुनने का उद्देश्य तो प्रकट करो....जबरदस्ती क्यों नास्तिकों का शोषण करवाने को तुले हुए हो :) और समझ सकते तो सब कुछ कह चुका...प्रमाणों पर न्यासंगत मंथन के योग्य ही नहीं हो क्योंकि श्रुत ज्ञान और ग्रंथ ज्ञान से अनभिज्ञ हो, और उपार्जित करने में अक्षम.किताबों का तो नाम आते ही तिलमिला जो जाते हो. समीक्षा का अधिकारी वह है जो ज्ञान सभी स्रोतों से बेहिचक ले और चिंतन मनन स्वविवेक से करे.

    हां यह आपने सही कहा...."जीवन-मूल्यों का पाठ तो पहले ही कमेंट में स्पष्ट था।" बशर्ते विवेक और बुद्धि दोनों को सक्रिय रखा हो.

    @ ईश्वर के कामों को ज़बरदस्ती अपने हाथ में ले लेने के औचित्य....

    ईश्वर के कौन से कामों को ज़बरदस्ती मैंने अपने हाथ में ले लिए?

    पता करके क्या करना है कि मैं लिख सकता भी हूँ या नहीं. जिस मार्ग जाना ही नहीं उसका पता ही क्यों पूछना. 'यहीं बसे रहो' (सौजन्य गुरू नानक)

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    1. जो चर्चा आपने शुरु ही नहीं की उसकी इति करनेवाले आप कौन हैं भला!? कैसा भयानक अहंकार है!? और जिसका आधार वास्तव में कहीं है ही नहीं।
      यहां बहस चल रही है कि एक-दूसरे का प्रोफ़ाइल बताने की प्रतियोगिता हो रही है!? कि आप यह नहीं मानते, वह नहीं पढ़ते, अंडा खाते हैं कि टमाटर खाते हैं!? जो बात चल रही है उसका जवाब दीजिए न!? बताईए कि ईश्वर के नाम पर आप जो कुछ कहते-करते हैं उसके बारे में ईश्वर कब आपको बताता है, कैसे बताता है, जब वह खुद आपसे ज़्यादा समर्थ है तो उसे आपकी क्या ज़रुरत पड़ गई!? इन सब बातों का जवाब दीजिए, और प्रमाण के साथ दीजिए, गप्प नहीं चलनेवाली यहां। लोगों को मूर्ख बनाने के दिन गए। आप कोई नानी नहीं हों और मैं कोई बच्चा नहीं हूं कि आप जो कुछ भी सुनाएंगा मैं सुनकर सो जाऊंगा। हर बात का प्रमाण देना होगा। वरना गप्पें हांककर वक्त बरबाद करने का काम न करें।

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    2. वक्त बरबाद न करें और सीधा इस प्रश्न का जवाब दें…आपने ही कहा है कि…

      @ ईश्वर के कामों को ज़बरदस्ती अपने हाथ में ले लेने के औचित्य....

      ईश्वर के कौन से कामों को ज़बरदस्ती मैंने अपने हाथ में ले लिए?

      मैने वो कौन से कार्य किए जो ईश्वर के थे?

      पता चले तो अपने अतिक्रमण और अहंकार को स्वीकार कर लूं।

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    3. पहले कमेंट से ही आपने जो ईश्वर का काम.काज अपने हाथ में ले लिया है.
      *अब बाथरूम की क्या शर्म,उसने तो आपको आपकी माँ के गर्भ में ही नंगा देख लिया था.:)वह बेहतर जानता है नंगा नहायेगा क्या? और निचोडेगा क्या?

      *उसे तो पता है जब काल पूर्ण हो जाता है तो टॉयलेट में शर्माने वाली इस नश्वर देह का पाखाना छूट जाता है पर वह घृणा नहीं करता दीन रोगी से.... :)

      पूरी बहस ही ईश्वर का हवाला देकर आप ख़ुद कर रहे हैं, मैंने आपसे पूछा भी कि जब यह व्यंग्य मैंने पब्लिश किया तो क्या ईश्वर आपसे कहने आया कि आप फ़लां ब्लॉग पर जाकर मेरा बचाव करो!?

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    4. आपके दिमाग का इस्तेमाल क्या यही है? क्या यही है सीधी सीधी बात? इस प्रकार झूठ का प्रयोग? ईश्वर का काम-काज अपने हाथ में लेने और ईश्वर के बारे में जानकारी देने में विरोधी अन्तर है। प्रस्तुत टिप्पणी में ईश्वर के कार्यों को हाथ में नहीं लिया गया। न मैने बाथरूम में होने का दावा किया न गर्भ स्कैन का!! अंत समय में नश्वर देह कितनी भी नापाक हो उस आत्मा को अपवित्र नहीं करती और ईश्वर नापाक देह के कारण उस आत्मा से घृणा नहीं करता (अब यह मत कहना आपको कैसे पता चला) क्योंकि सिद्धांतो से स्पष्ट है कि कर्म देखे जाते है, शरीर नहीं। इस बात में भी मात्र जानकारी है, मैं कहां दुष्कर्मों पर फैसला या कर्मफल बांट रहा था, जो आपको नागवार गुजरा और इसे आपके झूठ के साथ ईश्वर का काम काज हाथ में लेना बताया? (अब यह मत कहना कि जानकारी देने को आपको क्या ईश्वर ने कहा था?) आप पोस्ट में और टिप्पणियों में बार बार पूछ जो रहे है।

      ईश्वर को किसी बचाव की जरूरत नहीं, न वह कोई ऐसी अपेक्षा रखता है। जैसे आप शोषण अत्याचार का विरोध करना अपना फर्ज समझते है उसी तरह दुर्विचारों के प्रसार के विरूद्ध हमारा अपनी बात रखना सजगता है। और कुछ नहीं।

      आपको क्या लगता है दंगे, आतंक, द्वेष, आक्रोश-आवेश और प्रतिशोध लेने वाले आस्तिक होते है? नहीं!! वे स्वार्थ खातिर धर्म का चोगा ओढे नास्तिक ही होते है। ईश्वर, हिंसा और शोषकों से मनमर्जी प्रतिशोध लेने की इजाजत नहीं देता। जहां हिंसा है वहां धर्म हो ही नहीं सकता। बाकी झूठे, मायावी और संकुचित स्वार्थों के अंधे तो धर्म का नाम बदनाम करने लिए ही दुष्कृत्य करते रहते है। तत्काल प्रतिफल नहीं मिलता इसलिए ऐसे तत्वों का हौसला बुलन्द रहता है, देर का फायदा उठाते है और आगामी अन्धेर की चिन्ता नहीं करते।

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    5. ‘अब यह मत पूछ लेना....’ मेरे सवालों का जवाब नहीं है। और मैं तो बार-बार पूछूंगा, हर बार पूछूंगा। हर संवेदनशील आदमी पूछेगा। जो भी नींद से जाग जाएगा, नशे से उबर आएगा, पूछेगा ही पूछेगा। कि आखि़र ईश्वर के नाम पर जो कुछ कहा-किया जाता है, जाता है वह कब, किस ईश्वर ने बताया किसे बताया!? ईश्वर को तो कभी किसीने कुछ करते-बताते देखा नही ंतो फिर ये कौन लोग हैं जो उसके बिहाफ़ पर अधिकारपूर्वक सब करते फिरते हैं!? किसने इन्हें नियुक्त किया है!? ईश्वर को बचाव की ज़रुरत नही ंतो आप क्यों उसका बचाव कर रहे हैं!? क्या आप ख़ुदको उससे ज़्यादा शक्तिशाली और अक्लमंद मानते हैं!?
      नास्तिक हिंदू, मुस्लिम, भारत, पाक़िस्तान जैसे बंटवारों में यक़ीन नहीं करते, वे इंसानियत में विश्वास करते हैं। नास्तिकों का सिर्फ़ एक ब्लॉग है, फिर भी वे मस्त हैं। कोई लाउडस्पीकर इस ब्लॉग पर नहीं लगा, कोई निमंत्रण पत्र नहीं बांटे जा रहे, कोई लड्डू नहीं बंट रहे फिर भी आप परेशान हैं, मारे-मारे फिर रहे हैं। साफ़ है कि समस्या आप ही के अंदर है। न नास्तिक आपको बुलाने जाते हैं, न भगवान आपसे कहने आते हैं कि मेरी सहायता करो मगर आप हैं कि दे चक्कर पे चक्कर मार रहे हैं जैसे कि आप न हुए तो ईश्वर को कोई पता नहीं क्या कर देगा। ईश्वर तो सर्वशक्तिमान बताया गया है। आप इत्ते परेशान क्यंू है फिर!? क्या ईश्वर की शक्ति पर विश्वास नहीं!? या कोई और बात है?
      क्या बात है आखि़र!?

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    6. इसीलिए मैने इस फालतू बहस की अपनी तरफ से इति कर दी थी।

      नास्तिकों का सिर्फ़ एक ब्लॉग है, फिर भी वे मस्त हैं। कोई लाउडस्पीकर इस ब्लॉग पर नहीं लगा, कोई निमंत्रण पत्र नहीं बांटे जा रहे, कोई लड्डू नहीं बंट रहे फिर भी आप परेशान हैं, मारे-मारे फिर रहे हैं। साफ़ है कि समस्या आप ही के अंदर है। न नास्तिक आपको बुलाने जाते हैं,

      कोढ में खाज जैसा अभिमान है यह्…

      पढते हो नहीं, और आवेश में ही लिप्त रहते हो…… हम बचाव कर ही नहीं रहे, वह शक्तिशाली अवश्य है किन्तु क्रोधी नहीं, बस इतना जान लो॥ कर्मों के न्याय पर हमें पूर्ण आस्था है। बचाव वचाव कुछ नहीं, क्या करना है वही जाने……

      अब आप प्रतिटिप्पणी करेंगे तब भी वापस नहीं आने वाला॥

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    7. परसाद के बारे में किसी विदवान की कोई क़िताब बता जाते......

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    8. सुज्ञ जी,

      ब्लोग्स पर होने वाली चर्चाओं का यही फायदा है की इन्हें हर कोई पढ़ सकता है ... यही बात मुझे राहत भी देती है ...अंतिम निष्कर्ष तो दृष्टिकोण पर ही निर्भर करेगा । जैसे एकांगी दृष्टिकोण वाले व्यक्ति को गीता सिर्फ एक धार्मिक ग्रन्थ लगती है जबकि व्यापक दृष्टि वाले को गीता में आधुनिक मनोविज्ञान के महत्वपूर्ण पहलू दिखते हैं |

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    9. संजय जी, विज्ञान और तकनीक का यही कमाल है कि उन्हें ग़ालियां देनेवाले भी एक दिन उनकी तारीफ़ करने को मजबूर हो जाते हैं। पता नहीं ईश्वर हर आविष्कार की जन्मस्थली पश्चिम को क्यों बनाता है? और क्रेडिट लेनेवालों को यहां क्यों भेज देता है? ब्लॉगिंग को ही देखो, कैसी ग़ज़ब की चीज़ है कि अंधविश्वासी भी उसका लोहा मानने लगे हैं, फ़िर भी पता नहीं क्यों भगवान ने उसे बनाने में और भारत में लाने में हज़ारों साल ख़र्च कर दिए! दुनिया-भर का क़ाग़ज़ और पेड़ तबाह हो गए। वैसे अच्छा यह हुआ कि अब लोग कमाए हुए तर्कों और ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद का फ़र्क समझने लगे हैं, अब लोग समझने लगे हैं कि चिंतन करनेवाले लोग कैसे होते हैं और चुराए माल पर अपना ठप्पा लगा लेने वाले कैसे होते हैं। देर आयद, दुरुस्त आयद।
      संजय जी, उसे चिंतन कहते हुए हंसी आती है जिसके तहत आदमी जहां पैदा हो जाता है वहां की हर चीज़ उसे महान लगने लगती है! मैं जहां पैदा हो गया वो घर महान, वो मां-बाप महान, वहां की क़िताबें महान, वहां की सड़के महान, वहां के गटर महान, वहां की बुराईयां महान, वहां का सब महान.......। हम चिंतन और विशुद्ध अहंकार में फ़र्क करना कब सीखेंगे नाथ!? हम कभी सोचना भी शुरु करेंगे कि जैकारे ही लगाते रहेंगे!?
      संजय जी, दृष्टिकोण अगर सचमुच हो, तार्किक हो तो एकल वार्तालाप भी लोगों के काम आ जाता है। अगर तर्क के नाम पर सिर्फ़ तोतारटंत हो और दृष्टिकोण के नाम पर पुराने सड़े-गले चश्में हों तो क्या एकांगी और क्या कुछ और!? ऐसी दृष्टिहीनता के साए में तो टाइमपास भी ख़तरनाक़ है।
      फ़िर मिलेंगे संजय जी।

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    10. व्यापक दृष्टिकोण वाले लोग तो सदैव ही कुछ नया करते हैं

      -This chain of schools has been teaching Sanskrit since 1975. Over the years, to their surprise, they have found an increasing number of children keen on learning the ancient language, even though the script and pronunciation is difficult for English speakers.

      http://www.ndtv.com/article/world/sanskrit-thriving-in-uk-schools-34267

      http://www.youtube.com/watch?v=F4kdjHFBvd4

      कभी अपने विचारों से असहमत लोगों को ठसबुद्धि, अन्धविश्वासी कहते हुए चर्चा[?] करने से वक्त मिले तो पढ़ लीजियेगा .. किसी किताब का लिंक तो आपको दे नहीं सकते

      मुझे हंसी नहीं आती बल्कि उस चिंतन पर अफ़सोस होता है जहां बिना अपने इतिहास और ज्ञान को जाने समझे बिना लोग उसे "टुच्ची और घटिया बातें", "सड़े-गले चश्में" कहने लगें।

      नोट : लोगों के पढ़ और समझ पाने की क्षमता में कमीं को ध्यान में रखते हुए कमेन्ट में कम से कम जानकारी रखी है

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    11. ऊपर दिए गए न्यूज लिंक को पढने में भी परेशानी हो तो ये वीडियो लिंक देख और सुन सकते हैं

      http://www.youtube.com/watch?v=AsY3NVrviiw

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    12. अगर कोई किसी लेख पर कोई तर्क दिए बिना कोई उसे नकारता है, कोई जवाब न बन पाने पर भी उल्टे दूसरे को पढ़ने की सलाह देता है, उसकी हंसी उड़ाना तो दिए को सूरज दिखाना है। यह लेखक की विनम्रता है कि वह लगातार एक ऐसे आदमी को जवाब दे रहा है जिसके पास कहने को अपना कुछ भी नहीं है, बार-बार किसी क़िताब का हवाला देने लगता है, कभी पैम्फ़लेट बांटने लगता है। इससे अ़च्छा होता कि आप क़िताब को भेज देते, लेखक उसीसे बात कर लेता, आप क्यों बीच में घुसकर कूद रहे हैं?
      दुनिया-भर में लाखों बच्चे अंग्रेज़ी सीख रहे हैं, उर्दू सीख रहे हैं, फ्रेंच सीख रहे हैं, जर्मन सीख रहे हैं, उसका इस बहस से क्या लेना-देना!? क्या ईश्वर संस्कृत वालों को देखी-देखी में कुछ कंसेशन देता है?
      आप अप्रासंगिक बातें करके अपनी पढ़ाई-लिखाई के बारे में क्या सिद्ध करना चाहते हैं!?

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    13. इसे कहते हैं चित भी मेरी और पट भी मेरी .... लगता है आप बिना जानकारी के किसी विषय पर व्यंग लिखना एक तार्किक काम मानते हैं ....
      रही बात किताबों का हवाला देने की तो वो इसलिए देना पडा क्योंकि मेरे पास कोई टूल नहीं जो पूरी किताब को कम्प्रेस करके एक कमेन्ट में भर दूँ और अगर मैं कोई सारगर्भित बात कहता हूँ तो आप उसे "तोता रटंत" और मुझे "ठस बुद्धि" और "अन्धविश्वासी" "चुराए माल पर अपना ठप्पा लगा लेने वाला" , लिंक दिया तो "पम्प लेट बांटने वाला" कह देते हैं ....... और ऊपर से खुद को विनम्र भी कह रहे हैं

      @दुनिया-भर में लाखों बच्चे अंग्रेज़ी सीख रहे हैं, उर्दू सीख रहे हैं, फ्रेंच सीख रहे हैं, जर्मन सीख रहे हैं, उसका इस बहस से क्या लेना-देना!?

      वीडियो को ठीक से सुनेंगे तो पायेंगे की उसमें संस्कृत स्क्रिप्चर्स, जिन्हें आप बिना पढ़े ही "टुच्ची और घटिया बातें", "सड़े-गले चश्में" कह रहे हैं, के बारे में भी कुछ कहा है... वही किताबें पढ़ भी लीजियेगा .... मैंने किसी एक्सपर्ट से मार्गदर्शन लेने को भी कहा जो शायद आपको आपकी शान के खिलाफ लगा हो लेकिन कोई भी विषय का ज्ञान तोता रटंत बन कर ना रह जाए उसके लिए ऐसा करना जरूरी लगता है

      .. और एक बात संस्कृत वही भाषा है जो अपनी ही देश में इतने सारे कथित रेशनलिस्ट होते हुए भी अनदेखी और अपमान झेलती रही है ..वही पश्चिम में सम्मान की नज़रों से देखी जाती है| इसे देख कर लगता है लगता है ये देश "बुद्धुओं" की नहीं फर्जी बुद्धि-जीवियों की टकसाल बनता जा रहा है ...धन्य हैं वो विकसित देश को हर मूल्यवान वस्तु को उचित सम्मान देते हैं ..
      (वैसे कभी कभार हमारे ही माल पर अपना ठप्पा लगा कर हम लोगों को लौटाते भी हैं. आराम-पसंद बुद्धिजीवियों को तो हजम भी तभी होता है)

      अब रही बात इश्वर के अस्तित्व की तो मैंने आपको वो रास्ता बता दिया ( वेदों ,ग्रंथों का अध्ययन, चिंतन, मनन ) जो मुझे ठीक लगता था ....जिन्हें सच में अपने प्रश्नों के उत्तर चाहिए वो इस रास्तें जा कर देख लें, जिन्हें सिर्फ यूँ ही बातें करके अपनी दुनिया में जीना है उन्हें तो कुछ करने की जरूरत ही नहीं |

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    14. न तो इस व्यंग्य का संस्कृत के महत्व के से कुछ लेना-देना है न मुझे ईश्वर के बारे जानकारी चाहिए। जो लोग इस व्यंग्य पर कमेंट करते हुए ईश्वर का ठेका लेकर बात करने लगे उनसे मैंने कहा कि अगर ईश्वर ने यह काम उन्हें सौंपा है तो वे इसे प्रमाणित करें। क़िताबों से ईश्वर प्रमाणित नहीं होता। मैंने आपको कोई सलाह नहीं दी कि नास्तिकता पर भगतसिंह को पढ़िए या मार्क्स को पढ़िए या चार्वाक को पढ़िए। मैं तो अपने तर्क देता हूं, मेरे लिए बहस का यही मतलब है। आपकी पसंद की क़िताबें पढ़कर शास्त्रार्थ करने में मेंरी कोई दिलचस्पी नहीं है। शास्त्रार्थ को मैं कोई अच्छी चीज़ नहीं मानता।
      पश्चिम आपकी तारीफ़ करे तो पश्चिम भी क़ाबिले-तारीफ़ और क़ाबिले-ज़िक्र हो जाता है, वरना पश्चिम राक्षसों की नगरी है। क्या-क्या ‘तर्क’ हैं!?
      ईश्वर के पास जाने का रास्ता आपने ढूंढ लिया है तो आप जाईए, यूं ही बात मत कीजिए, जल्दी निकल लीजिए।

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    15. पश्चिम राक्षसों की नगरी है। ये किसने कहा ???

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    16. @न तो इस व्यंग्य का संस्कृत के महत्व के से कुछ लेना-देना है न मुझे ईश्वर के बारे जानकारी चाहिए।
      @ आपकी पसंद की क़िताबें पढ़कर शास्त्रार्थ करने में मेंरी कोई दिलचस्पी नहीं है। शास्त्रार्थ को मैं कोई अच्छी चीज़ नहीं मानता।

      यही बात तो समझ नहीं आयी की आपने बिना पढ़े ही "टुच्ची और घटिया बातें", "सड़े-गले चश्में" क्यों कहा ??? कोई तो आधार होगा ही

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    17. हर वो चश्मा सड़ा-गला है जिसे पहनने वाले की अपनी कोई दृष्टि विकसित नहीं हो पायी फिर भी वह दूसरों को ज़बरदस्ती घर-घर जाकर सलाह देता फ़िरता है कि मेरा चश्मा लगाकर देखो, आंखें खुल जाएंगी।
      अजीब है वह आदमी जो इस बात पर ख़ुश होता है कि पश्चिम में कितने बच्चे संस्कृत पढ़ रहे हैं, पश्चिम तारीफ़ कर रहा है। अरे भैया, यहां तो कोई एक टांग पर खड़ा हो जाए तो भीड़ लग जाती है। तो? उसकी उपयोगिता क्या है? आप ख़ुदको देखिए, अभी आप ब्लॉग पर लिख रहे हैं, कम्प्यूटर की सहायता से लिख रहे हैं, बिजली से वो चल रहा है। ये सब पश्चिम से आए हैं या संस्कृत से बने हैं? पश्चिम के बच्चे संस्कृत पढ़ना(अगर वाक़ई पढ़ रहे हैं) छोड़ दे ंतो उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा, आप ये तीनों चीज़ें छोड़ दें, आप मुझसे बात भी नहीं कर पायेंगे। करके देखिए ना।
      आप संस्कृत में कमेंट क्यों नहीं करते? संस्कृत में बहस क्यों नहीं करते? संस्कृत में ब्लॉग क्यों नहीं बनाते? करके देखिए ना।

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    18. पश्चिम ‘राक्षसों की नगरी’ नहीं है तो आपको संस्कृत की क्यों पड़ी है? किस बात के लिए इतना पैसा, इतना समय, इतना बचपन दांव पर लगाया जा रहा है? अंग्रेज़ी से दुनिया का, हिंदी से बचे-ख़ुचे भारत का और ऐसे ही बाक़ी भाषाओं से दूसरे देशों का काम चल तो रहा है? संस्कृत की क्या ज़रुरत आ पड़ी!? ‘राक्षसों की नगरी’ मुहावरे में कहा है। आपको क्या उंगली पकड़के एक-एक बात समझानी पड़ेगी? आप पहले ही कमेंट में इतना बड़ा झूठ और हर कमेंट में बेसिर-पैर की अप्रासंगिक बातें कर सकते हैं, मैं एक मुहावरा नहीं बोल सकता!!
      मैंने कहा कि आपकी बताई क़िताबों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं। क़िताबें मैंने ख़ूब पढ़ी हैं-पर अंधी श्रद्धा से नहीं पढ़ता, अपने विवेक का इस्तेमाल करता हूं क्योंकि जानता हूं कि क़िताबें लिखनेवाले, छापनेवाले, बेचनेवाले सब इंसान होते हैं। और किसी भी एक लेखक ने सारी दुनिया की बुद्धि का ठेका नहीं ले लिया। यह नितांत निम्न श्रेणी का अहंकार है। शास्त्रार्थ के बारे में मैंने बचपन में कोर्स की किसी क़िताब में पढ़ा था कि दोनों पक्ष कुछ शास्त्रों के आधार पर बहस करते थे। मुझे तभी यह अजीब लगा था। बाद में मुझे किसीने बताया कि हमारे ज़्यादातर शास्त्र किन्हीं ख़ास जाति-वर्ण के लोगों ने लिखे थे। मुझे और भी हैरानी हुई कि एक तो इस अजीब तरह की बहस में मौलिक विचार या तर्क के लिए तो कोई जगह ही नहीं है, दूसरे, जिन क़िताबों को पढ़कर बहस करनी है वे भी किसी ख़ास वर्ण के लोगों की लिखी हुई! यह तो चालाक़ी हुई। आप भी मुझे अपनी पसंद की क़िताब पढ़कर आपसे बात करने को कह रहे हैं। मैं लिखता भी इसलिए हूं और बहस में भी इसलिए जाता हूं कि मेरे पास कहने को अपना कुछ है। मैं बेवकूफ़ियों और चालाक़ियों में आकर अपना वक्त ख़राब नहीं करता। अगर कोई सेंसीबिल आदमी मुझसे कोई क़िताब पढ़ने को कहता है तो मैं ज़रुर कोशिश करता हूं।

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    19. @हर वो चश्मा सड़ा-गला है जिसे पहनने वाले की अपनी कोई दृष्टि विकसित नहीं हो पायी फिर भी वह दूसरों को ज़बरदस्ती घर-घर जाकर सलाह देता....

      @कोई सेंसीबिल आदमी मुझसे कोई क़िताब पढ़ने को कहता है तो मैं ज़रुर कोशिश करता हूं।

      सर, आपने मेरी दृष्टि देखी नहीं और फैसला भी सुना दिया .. अभी मैं तो नोलेज गेप भरने की ही कोशिश कर रहा हूँ .. लेकिन आप तो अपमान पर अपमान किये जा रहे हैं .. इंसान में नोलेज या तमीज में से कोई एक चीज तो होनी चाहिए न !

      ..शायद आप भूल गए की पहले आपने कहा था

      @ मैं अपना वक्त बरबाद करने में यक़ीन नहीं रखता। ऐसी चीज़ों में तो बिलकुल भी नहीं जिनसे एक स्वस्थ हंसी तक न पैदा हो सके।

      @ज़रुरी नहीं की टुच्ची और घटिया बातें जिनमें इंसान को इंसान से नीचा करने के षड्यंत्र भरे पड़ें हों, उनमें सबको ‘व्यूज़’ दिखाई पड़ें।


      और सबसे ज्यादा हंसाने वाली बात ये है की आपने ये विचार उस सामग्री को पढ़े बिना दिए है ..

      संस्कृत को लेकर आपका दुःख देखा नहीं जाता इसलिए बता दूँ की संस्कृत की ही जानकारी होने से कुछ का कुछ अर्थ बताने वाले लोगों से बचाव रहता है .. अब हम आपकी तरह तो है नहीं ना की दूसरों के विचार सुन सुन कर ही अपनी ओपिनियन बना लें ...जैसा यहाँ आपने कहा ....

      @मुझे किसीने बताया कि हमारे ज़्यादातर शास्त्र किन्हीं ख़ास जाति-वर्ण के लोगों ने लिखे थे। मुझे और भी हैरानी हुई....

      रही बात आधुनिक कल में महत्त्व की.... तो ये लिंक देख लीजियेगा (और आदतन आपकी जानकारी बढाने के अपराध में मुझे अपमानित करना मत भूलियेगा )

      http://www.aaai.org/ojs/index.php/aimagazine/article/view/466


      @‘राक्षसों की नगरी’ मुहावरे में कहा है।

      अपने अपने मुहावरे दूसरों पर मत लादिये

      @आप पहले ही कमेंट में इतना बड़ा झूठ और हर कमेंट में बेसिर-पैर की अप्रासंगिक बातें कर सकते हैं, मैं एक मुहावरा नहीं बोल सकता!!

      यहाँ देखने वाले देख रहे होंगे की मैंने अपनी शुरूआती कमेंट्स में क्या कहा और ये भी की आपको रिप्लाई की सुविधा की इस्तेमाल करना भी ठीक से नहीं आता था .. आप किसी चीज को अपशब्द बोलें वो तो प्रासंगिक है .. अगर कोई उस पर आप जानकारी बढ़ा दे तो बात बेसिर-पैर की अप्रासंगिक हो जायेगी ..ये भी खूब रही

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    20. आपकी कोई दृष्टि होती तो मैं देखता। जो आदमी पहले कमेंट में कहता है कि ‘इसपर चर्चा से कोई फ़ायदा नहीं’ और फिर इस घोषित पलायन के साथ घुमा-फिरा कर चर्चा भी करे जा रहा है। तुर्रा यह कि चर्चा में लगातार अप्रासंगिक बातें, ख़ुद निरुत्तर हो जाने पर भी दूसरे को क़िताब पढ़ने और ऐक्सपर्ट की सलाह लेने की सलाह, विषय से हटकर संस्कृत का प्रचार......
      फिर भी मैं जवाब देता रहा।
      संस्कृत को लेकर सुख-दुख आपके होंगे, मेरे लिए वह कई भाषाओं में से एक भाषा है।
      मेरी आपको अपमानित करने में कोई रुचि नहीं है, आप ख़ामख्वाह ख़ुदको महत्व दे रहे हैं। मुझे आपका नाम ही नहीं मालूम, न मालूम करने में रुचि है। आप ख़ुद ही आ रहे हैं बार-बार। लेख से संबंधित किसी बात पर आप जवाब नहीं दे सके।
      अपनी नॉलेज(!) को अपने काम में लीजिए, ज़बरदस्ती मत बांटिए।
      मुझे आपके लिंकस् में कोई रुचि नहीं, इनका इस लेख से भी कोई भी संबंध नहीं है।
      इंसान में इंसानियत न हो तो नॉलेज का दुरुपयोग करेगा और तमीज के तो कभी मायने भी नहीं समझ पाएगा।
      अब कृपया माफ़ करें। अपने पैम्फ़लेट वहां बांटें जहां लोगों की इनमें रुचि हो।
      कृपया पीछा छोड़ें, माफ़ करें।
      इन शब्दों का मतलब तो समझते होंगे कि संस्कृत में अनुवाद करवाऊं!?
      अंट-संट, विषय से हटकर बातें करके लोगों का वक्त बरबाद करना बंद करें।
      कृपया पीछा छोड़ें। फिर एक बार कह रहा हूं पीछा छोड़ें, दूसरों का वक्त बरबाद न करें।

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    21. धन्य हो .....खुद ही आये थे एकल वार्तालाप का नाटक करते हुए .

      रही बात लिनक्स और चर्चा की तो ये कम से कम आप जैसे कथित बुद्धि जीवी की सोच से लोगों को परिचित करवाने के काम तो आ ही जायेंगे ..

      और हाँ एक बात और ....फ़ोकट में मिले ब्लॉग पर एक आर्टिकल लिखने भर से आप उस पेज के मालिक नहीं हो जाते प्रभु !

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    22. मालिक तो आप हैं पूरे देश के! बाक़ी सब तो किराएदार हैं।

      जिस पोस्ट पर आपने कमेंट किया है वह मेरी पोस्ट हैं।

      और कमेंट करने से पहले सोच लिया करें कि सीधी बात करनी है या ऐसा रास्ता ढूंढना है जिससे जब मर्ज़ी ‘चर्चा से फ़ायदा नहीं’ करके पलायन का जुगाड़ भी कर लेना है और जब चाहे ‘पेज आपका नहीं’ कहके दूसरों के कंधे से बंदूक चलानी है!

      अपना परिचय दिया नहीं, दूसरे से परिचित करा रहे हैं।

      पेज तो और भी बहुत से हैं, वो भी फ्री के हैं, वहां जाकर भी कीजिए पलायनवादी कमेंटस्।

      लिंक चेपने में दो मिनट लगते हैं, इसका नॉलेज से कोई लेना-देना नहीं है। ग़लतफ़हमी में न रहें।

      शायद ऐसे ही पीछा छूट जाए।

      एक बार फिर समझ लें-

      ‘‘कमेंट करने से पहले सोच लिया करें कि सीधी बात करनी है या ऐसा रास्ता ढूंढना है जिससे जब मर्ज़ी ‘चर्चा से फ़ायदा नहीं’ करके पलायन का जुगाड़ भी कर लेना है और जब चाहे ‘पेज आपका नहीं’ कहके दूसरों के कंधे से बंदूक चलानी है!’’

      अब कृपया पीछा छोड़ें।

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    23. @सीधी बात करनी है या ऐसा रास्ता ढूंढना है जिससे जब मर्ज़ी ‘चर्चा से फ़ायदा नहीं’ ....

      हद हो गयी .. आपको अभी तक समझ नहीं आया .. इस लेख को पढ़ते ही लेखक के दिमाग इस मामले में तो पूरी तरह खाली है पता चल जाता है .. और ये भी की व्यंग लिखने सोचने के लिए उसके पास भरपूर समय है.......इसलिए वेदों और उपनिषदों का अध्ययन के अनुरोध किया था ....लेकिन आपको अपना और दूसरों का समय फालतू ही लगता है शायद ..यहाँ देख लीजिये डाटा से विस्डम तक का सफ़र

      http://turing.une.edu.au/~comp292/Lectures/HEADER_KM_2004_LEC_NOTES/node4.html

      आपकी बातों में कईं विरोधाभास हैं ... कुछ पहले ही बता चुका हूँ

      @अपना परिचय दिया नहीं, दूसरे से परिचित करा रहे हैं।

      आप जिस तरह आप से असहमत लोगों पर व्यक्तिगत कमेन्ट करते हैं , ये एक सही कदम है । वैसे मैंने आपकी सोच से परिचय के बारे में कहा था ...कुछ बोलने से पहले बात को ठीक से समझ तो लिया करें

      @लिंक चेपने में दो मिनट लगते हैं, इसका नॉलेज से कोई लेना-देना नहीं है। ग़लतफ़हमी में न रहें।

      तो आपको क्या लगा आपके लिए पूरा आर्टिकल टाइप करूँगा ? प्रभु! इतना समय आप ही के पास होगा मेरे पास नहीं है ..

      और ये जो बार बार "पीछा छोड़ने" को कह रहे हैं उसका मतलब " अंत में मैं ही कमेन्ट करूँगा" है क्या ? :)

      सार में कहूंगा : लोगों को बेवकूफ समझना और बनाना छोड़ें ...ये सार्वजनिक प्लेटफोर्म है .लिखने से पहले थोड़ा सोचा करें ... 'सार्वजनिक' का मतलब समझते हैं ना? या अंग्रेजी में ट्रांसलेट करना पड़ेगा ?

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    24. पहली बार में पता चल गया लेखक का दिमाग़ खाली है फ़िर भी लगे हैं दिन-रात बेचारे। सैकड़ों ब्लॉग हैं वहां जाएं और ऐसी खाली-पीली चर्चा करें न।
      दिमाग़ हो, और खाली हो तभी उसमें नया विचार आता है। दिमाग़ ही न हो, हो तो कचरे से भरा हो तो फिर तो कहने ही क्या!? मुझे आपकी खाली खोपड़ी का अंदाज़ है तभी तो कभी आपमें से किसीके ब्लॉग पर गया नहीं।
      पूरी बहस में बिलकुल साफ़ है कि ईश्वर को लेकर विभिन्न संदर्भों में कोई भी प्रमाण न दे सका। अब अहंकार को बचाया कैसे जाए, उसी दिशा में सारा प्रयास चल रहा है, अल्लम-गल्लम इधर की, उधर की जोड़-तोड़ करके। अब अहंकार को बचाने का एक ही रास्ता बचा कि आखिरी कमेंट हमारा हो, मगर हाय, वो भी अपने ही मुंह से बता बैठे।
      तर्क है नहीं, बेचारे क़िताबें और लिंक लिए घूम रहे हैं। सारे पटाखे सीले निकल रहे हैं। बहस चल रही है कि ईश्वर अगर सब देखता है तो बुरा देखके चुप क्यों रहता है? जवाब आ रहा है कि दुनिया में कितने बच्चे संस्कृत पढ़ रहे हैं।
      ईश्वर को प्रमाणित करो न। क़िताब बेचारी क्या करेगी? बात अगर तर्कपूर्ण है तो बिना क़िताब के भी मान ली जाती है, बात बेढंगी हो तो कितनी बढ़िया क़िताब से आयी हो, कचरा ही रहेगी।
      सारा प्लास्टर उखड़ चुका है, अब आखि़री कमेंट से लीपा-पोती करके ख़ुश होलो।़ मैं अपना प्रश्न फ़िर दोहरा रहा हूं-

      ** जो बात चल रही है उसका जवाब दीजिए न!? बताईए कि ईश्वर के नाम पर आप जो कुछ कहते-करते हैं उसके बारे में ईश्वर कब आपको बताता है, कैसे बताता है, जब वह खुद आपसे ज़्यादा समर्थ है तो उसे आपकी क्या ज़रुरत पड़ गई!? इन सब बातों का जवाब दीजिए, और प्रमाण के साथ दीजिए, गप्प नहीं चलनेवाली यहां। लोगों को मूर्ख बनाने के दिन गए। आप कोई नानी नहीं हों और मैं कोई बच्चा नहीं हूं कि आप जो कुछ भी सुनाएंगा मैं सुनकर सो जाऊंगा। हर बात का प्रमाण देना होगा। वरना गप्पें हांककर वक्त बरबाद करने का काम न करें।**
      **यह मेरे सवालों का जवाब नहीं है। और मैं तो बार-बार पूछूंगा, हर बार पूछूंगा। हर संवेदनशील आदमी पूछेगा। जो भी नींद से जाग जाएगा, नशे से उबर आएगा, पूछेगा ही पूछेगा। कि आखि़र ईश्वर के नाम पर जो कुछ कहा-किया जाता है, जाता है वह कब, किस ईश्वर ने बताया किसे बताया!? ईश्वर को तो कभी किसीने कुछ करते-बताते देखा नही ंतो फिर ये कौन लोग हैं जो उसके बिहाफ़ पर अधिकारपूर्वक सब करते फिरते हैं!? किसने इन्हें नियुक्त किया है!? ईश्वर को बचाव की ज़रुरत नही ंतो आप क्यों उसका बचाव कर रहे हैं!? क्या आप ख़ुदको उससे ज़्यादा शक्तिशाली और अक्लमंद मानते हैं!?
      नास्तिक हिंदू, मुस्लिम, भारत, पाक़िस्तान जैसे बंटवारों में यक़ीन नहीं करते, वे इंसानियत में विश्वास करते हैं। नास्तिकों का सिर्फ़ एक ब्लॉग है, फिर भी वे मस्त हैं। कोई लाउडस्पीकर इस ब्लॉग पर नहीं लगा, कोई निमंत्रण पत्र नहीं बांटे जा रहे, कोई लड्डू नहीं बंट रहे फिर भी आप परेशान हैं, मारे-मारे फिर रहे हैं। साफ़ है कि समस्या आप ही के अंदर है। न नास्तिक आपको बुलाने जाते हैं, न भगवान आपसे कहने आते हैं कि मेरी सहायता करो मगर आप हैं कि दे चक्कर पे चक्कर मार रहे हैं जैसे कि आप न हुए तो ईश्वर को कोई पता नहीं क्या कर देगा। ईश्वर तो सर्वशक्तिमान बताया गया है। आप इत्ते परेशान क्यंू है फिर!? क्या ईश्वर की शक्ति पर विश्वास नहीं!? या कोई और बात है?
      क्या बात है आखि़र!?**

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    25. @लेखक का दिमाग़ खाली है फ़िर भी लगे हैं दिन-रात बेचारे।

      दिन-रात आप लगे हैं , मुझे तो सप्ताह में एक दो दिन ही मिलते हैं ..ना माने तो मेरे कमेंट्स पर डेट देख लीजियेगा

      @दिमाग़ हो, और खाली हो तभी उसमें नया विचार आता है।

      मैंने सुना था खाली दिमाग शैतान का घर होता है .. आज देख भी रहा हूँ

      @मुझे आपकी खाली खोपड़ी का अंदाज़ है तभी तो कभी आपमें से किसीके ब्लॉग पर गया नहीं।

      मेरा तो ब्लॉग ही नहीं है :)

      @अब अहंकार को बचाया कैसे जाए, उसी दिशा में सारा प्रयास चल रहा है,

      लेखक की पोल खुल रही है ... लेखकीय अहंकार पीड़ित वह अपशब्द बोल कर , बद-तमीजी कर के असहमत लोगों की भीड़ कम कर रहा है , इनको भी समर्थकों से इगो मसाज की आदत है

      @अहंकार को बचाने का एक ही रास्ता बचा कि आखिरी कमेंट हमारा हो

      ग्रो अप ग्रोवर साहब, हर बात पे काउंटर मारना जरूरी नहीं होता है, आपकी इस आदत से पहले से वाकिफ हूँ , आपकी तो याददाश्त भी कमजोर है

      @बेचारे क़िताबें और लिंक लिए घूम रहे हैं। सारे पटाखे सीले निकल रहे हैं।

      पहले दिया हुआ पेकेट तो खोल लो .. बाहर से दिव्यदृष्टि[?] से बता दिया की सीले हुए पठाखे हैं

      @बहस चल रही है कि ईश्वर अगर सब देखता है तो बुरा देखके चुप क्यों रहता है? जवाब आ रहा है कि दुनिया में कितने बच्चे संस्कृत पढ़ रहे हैं।

      क्या एडिटिंग की है ....बीच का कोई लिंक नहीं दिया .. मान गए :)

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    26. अपनी तरफ से हर बात का जवाब ऊपर कमेंट्स बता चुका हूँ ........ आप बिना पढ़े लेख लिखते रहिये और अपने भक्तों से अपनी जय जय कार सुन कर खुश होते रहिये

      'शायद' मेरा वापस नहीं आना हो .... आप अंत में कमेन्ट करके खुश हो लेना :)

      शुभ कामनाएं

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    27. बहुत ही यथार्थ परक चर्चा कर रहे है साधारण पाठक जी,

      निश्चित ही लेखक की विरोधाभासी सोच उजागर हो रही है।

      एक बार दूसरों पर खाली दिमाग का आरोप जड कर खाली दिमाग को अज्ञानी साबित कर रहे है, दूसरी और अपने दिमाग को भी खाली बता रहे है। उसी खाली दिमाग के लिए नए पठन पाठन से इन्कार कर रहे है और अपने जमा कचरे को अक्ल बता रहे है। न तो पढना चाहते है न कोई जानकारी स्वीकार कर रहे है। पता नहीं फिर वह खाली दिमाग किस काम का?
      कहते है मैंने भी पूछा, हर सम्वेदनशील प्रश्न पूछेगा। सम्वेदनशीलता क्या होती है पता है? पाठक को प्रत्युत्तर देते हुए भी विनम्रता चाहिए…? सहिष्णुता चाहिए। सबसे पहले तो इन्हें सम्वेदना का मतलब ही समझना होगा।

      लगे रहिए, साधारण पाठक जी, आप विनय विवेक और विनम्रता से पेश आ रहे है। और तब तक कोई दुविधा नहीं।

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    28. आपका ब्लॉग है कि नहीं मैंने तो यह जानना भी ज़रुरी नहीं समझा।
      नाम बताने की हिम्मत नहीं ब्लॉग कैसे बताएंगे!?
      लगे रहो और एक दूसरे की पीठ थपथपाते रहो।
      ज़िंदगी से भागो और पुरानी क़िताबों में यथार्थ ढूंढो।
      हमारे यहां भक्त नहीं मित्र होते हैं-सब बराबर, कोई ऊंच-नीच नहीं। यहां तो मैं अकेला हूं और आप 6-7 हो! झूठ बोलने में रत्ती-भर भी हिचकिचाहट नहीं होती क्या?
      डेट क्या देखनी है, साफ़ ही है कि 4 दिन जवाब नहीं सूझा तो 5वें दिन फ़िर कोई ईंट-रोड़ा जोड़ लाए। एक दिन में पांच कमेंट हों कि पांच दिन में एक कमेंट, स्तर वही है।
      हांलांकि बताने का कोई फ़ायदा नहीं फ़िर भी बता देता हूं कि एक जगह ख़ाली दिमाग़ लिखा है दूसरी जगह खाली खोपड़ी लिखा है।
      मेरे सवाल साफ़ हैं:-


      ** जो बात चल रही है उसका जवाब दीजिए न!? बताईए कि ईश्वर के नाम पर आप जो कुछ कहते-करते हैं उसके बारे में ईश्वर कब आपको बताता है, कैसे बताता है, जब वह खुद आपसे ज़्यादा समर्थ है तो उसे आपकी क्या ज़रुरत पड़ गई!? इन सब बातों का जवाब दीजिए, और प्रमाण के साथ दीजिए, गप्प नहीं चलनेवाली यहां। लोगों को मूर्ख बनाने के दिन गए। आप कोई नानी नहीं हों और मैं कोई बच्चा नहीं हूं कि आप जो कुछ भी सुनाएंगा मैं सुनकर सो जाऊंगा। हर बात का प्रमाण देना होगा। वरना गप्पें हांककर वक्त बरबाद करने का काम न करें।**
      **यह मेरे सवालों का जवाब नहीं है। और मैं तो बार-बार पूछूंगा, हर बार पूछूंगा। हर संवेदनशील आदमी पूछेगा। जो भी नींद से जाग जाएगा, नशे से उबर आएगा, पूछेगा ही पूछेगा। कि आखि़र ईश्वर के नाम पर जो कुछ कहा-किया जाता है, जाता है वह कब, किस ईश्वर ने बताया किसे बताया!? ईश्वर को तो कभी किसीने कुछ करते-बताते देखा नही ंतो फिर ये कौन लोग हैं जो उसके बिहाफ़ पर अधिकारपूर्वक सब करते फिरते हैं!? किसने इन्हें नियुक्त किया है!? ईश्वर को बचाव की ज़रुरत नही ंतो आप क्यों उसका बचाव कर रहे हैं!? क्या आप ख़ुदको उससे ज़्यादा शक्तिशाली और अक्लमंद मानते हैं!?
      नास्तिक हिंदू, मुस्लिम, भारत, पाक़िस्तान जैसे बंटवारों में यक़ीन नहीं करते, वे इंसानियत में विश्वास करते हैं। नास्तिकों का सिर्फ़ एक ब्लॉग है, फिर भी वे मस्त हैं। कोई लाउडस्पीकर इस ब्लॉग पर नहीं लगा, कोई निमंत्रण पत्र नहीं बांटे जा रहे, कोई लड्डू नहीं बंट रहे फिर भी आप परेशान हैं, मारे-मारे फिर रहे हैं। साफ़ है कि समस्या आप ही के अंदर है। न नास्तिक आपको बुलाने जाते हैं, न भगवान आपसे कहने आते हैं कि मेरी सहायता करो मगर आप हैं कि दे चक्कर पे चक्कर मार रहे हैं जैसे कि आप न हुए तो ईश्वर को कोई पता नहीं क्या कर देगा। ईश्वर तो सर्वशक्तिमान बताया गया है। आप इत्ते परेशान क्यंू है फिर!? क्या ईश्वर की शक्ति पर विश्वास नहीं!? या कोई और बात है?
      क्या बात है आखि़र!?**

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    29. @हमारे यहां भक्त नहीं मित्र होते हैं-सब बराबर, कोई ऊंच-नीच नहीं। यहां तो मैं अकेला हूं और आप 6-7 हो! झूठ बोलने में रत्ती-भर भी हिचकिचाहट नहीं होती क्या?

      सब बराबर - जब तक सहमत हों .. वरना वे सभी अपशब्द सुनने पड़ेंगे जो लगता है कभी लेखक ने खुद सुने होंगे.. हा हा

      @डेट क्या देखनी है, साफ़ ही है कि 4 दिन जवाब नहीं सूझा तो 5वें दिन फ़िर कोई ईंट-रोड़ा जोड़ लाए।

      धन्य हो प्रभु ! आपका उदेश्य सिर्फ डिस्कशन में जीतना ही लगता है , ठीक है भाई आप जीते .. लेकिन लोगों को और भी काम होते हैं इस दुनिया में ब्लोगिंग के अलावा .. यकीन मानिए :)

      आपकी पढने समझने की कोई इच्छा नहीं है तो वैसा ही कीजिये जैसा आज तक करते आ रहें हैं .... उन्ही से पूछ लीजिये जिन्होंने आपको शास्त्रों के बारे में बताया था ..और आपको बड़ा अजीब लगा था .. फिर उसी उधारी सोच / दृष्टिकोण को आधार बना कर समय खपाते रहिये अपने लेखों में

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    30. डिस्कशन में जीतना उद्देश्य उनका है जो कुछ न होने पर भी कभी लेखक का प्रोफ़ाइल बताने लगते हैं कभी क़िताबों को रोने लगते हैं। ‘चोरी और सीनाज़ोरी’ जैसी हरकत यह कि ख़ुदके पास कहने को क़िताबों के अलावा एक शब्द नहीं हैं और दूसरे के तर्कों को उधार का बता रहे हैं।
      जब दो लोग दौड़ में उतर गए हो तो एक, दूसरे से कहे कि अगर तुमने मिल्खासिंह की आत्मकथा नहीं पढ़ी तो दौड़ छोड़ दो, पहले उसे पढ़के आओ तो दूसरा मूर्ख ही होगा कि दौड़ में अपनी जीत की संभावना को छोड़कर किताब पढ़ने जाएगा। अरे अब तो जो है, दौड़ बता ही देगी।
      मजबूरी में ही सही, शुक्र है आपको समझ में तो आया कि ‘और भी काम होते हैं’। अब नाम की तरह स्वीकृति के कारण को भी छुपाईए।
      आपसे बहस में क्या जीतना, आपकी वजह से बहस क़ायदे से शुरु ही नहीं हो पाई, सिर्फ़ वक्त बरबाद हुआ।

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    31. @ "दिमाग़ हो, और खाली हो तभी उसमें नया विचार आता है। दिमाग़ ही न हो, हो तो कचरे से भरा हो तो फिर तो कहने ही क्या!?"

      अपनी इस बात का अपने पर ही एक बार चिंतन क्यों नहीं कर लेते? दिमाग है तो प्रयोग भी तो करो.... और बेचारे दीन हीनों से ठगी करने वाले स्वार्थी तत्वों की उधार की मूढमति का भी क्या लाभ?

      प्रमाण!! प्रमाण!! प्रमाण!!
      आपको प्रमाण दे भी दिए जाय तो आपके जैसे तथ्य वंचको का क्या भरोसा, जिन्हें ज्ञान से ही एतराज हो, किताबों से तो बाप मारे का बैर हो, जानकारियोँ की बात से ही चिड जाते हो, चर्चा के नाम पर बहस नहीं, वितंडा ही आती हो. ऐसे लोगों को किसी भी प्रमाण पर फिरते देर नहीं लगती.

      जैसे प्रमाण के लिए डीएनए की बात आते ही जैसे दुखती नस को छू लिया हो, बगलें झाकने लगे हो और येन केन डीएनए के प्रमाण को खारिज करके पलट्दास बने हो उन्हे किसी भी प्रमाण पर कायम नहीं किया जा सकता.

      किताबों के प्रमाण ये मानेंगे नहीं, दार्शनिकों के मत पर सोचेंगे तक नहीं. अपने स्वयं के जीवन के प्रति भी कृतघ्न ही बने रहेंगे. जो तर्क प्रतितर्क पर निष्ठावान नहीं है, निश्चित ही अप्रमाणिक जड्-बोध कोई भी प्रमाणिक उत्तर दिया जाना व्यर्थ है.

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    32. बेचारेपन का बहुत प्रलाप हो चुका, मैं अकेला हूं और आप 6-7 हो! और हम नास्तिकों का एक ही ब्लॉग है.:( और यहां क्यों आते हो वगैरह वगैरह...ब्ला... ब्ला... ब्ल्ला.. तो भाई इस नास्तिकों के ब्लॉग को सार्वजनिक क्यों रखा हुआ है, प्राईवेट क्यों नहीं कर देते, अपने नास्तिक गुट तक सीमित!! फिर खुशी से अपने नास्तिक मित्रों के साथ ईश्वर की जी भरकर ठठा-मस्करी करो. अंधा बांटे रेवडी की तरह अपने रेवड का हास्य बोध चेताओ कोई कहने तो क्या जानने भी नहीं फटकेगा. और उन लोगों को बक्श दो जो साकारात्मक है, आशावादी है और आस्था वा आत्मबल के आधार पर अपना जीवन सार्थक करते रहे है और करना चाहते है. यह डेढ दिमागी श्रम आप तक स्थिर रहे उसी में आपकी और जगत की भलाई है.

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    33. आजके आदमी के दिमाग़ को नकार कर दस-बीस हज&