Saturday, April 24, 2010

नास्तिकता सहज है

|| नास्ति दतम् नास्ति हूतम् नास्ति परलोकम् ||


यह पंक्ति मैं पहली बार पढ़ रहा हूं।

जब मैं नास्तिक हुआ तो मैंने चार्वाक या माक्र्स का नाम तक नहीं सुना था। ऐसी कोई भारतीय या अन्य परंपरा है, इसकी मुझे हवा तक नहीं थी। कोई वामपंथी पार्टी भी है, यह भी मुझे बहुत बाद में जाकर पता चला। हां, बाद में सरिता-मुक्ता फ़िर हंस जैसी कुछ पत्रिकाओं से इस विचार को बल ज़रुर मिला। मेरा मानना है कि नास्तिकता सहज स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। हर बच्चा जन्म से नास्तिक ही होता है। धर्म, ईश्वर और आस्तिकता से उसका परिचय इस दुनिया में आने के बाद कराया जाता है, इसी दुनिया के कुछ लोगों द्वारा। कल्पना कीजिए कि इस पृथ्वी पर कोई ऐसी जगह है जहां ईश्वर का नामो-निशान तक नहीं है। ईश्वर की कोई ख़बर तक उस देश में कहीं से नहीं आती। कोई मां-बाप, रिश्तेदार, पड़ोसी, समाज, बड़े होते बच्चों को ईश्वर की कैसी भी जानकारी देने में असमर्थ हैं, क्योंकि उन्हें ख़ुद ही नहीं पता। क़िस्सों और क़िताबों में ईश्वर का कोई ज़िक्र तक नहीं है। तब भी क्या वहां ईश्वर के अस्तित्व या जन्म की कोई संभावना हो सकती है !?

दूसरे, क्या नास्तिकता को किसी परंपरा की ज़रुरत है ? मेरी समझ में जहां तर्क, विवेक, विचार, मौलिकता और वैज्ञानिकता है वहां कभी न कभी नास्तिकता आ ही जाएगी। चाहे ऐसी कोई परंपरा हो न हो। नास्तिकता तो ख़ुद ही परंपरा के खि़लाफ़ एक विचार है। यह तो प्रगतिशीलता, तर्कशीलता वैज्ञानिेकता और मानवता का मिश्रण है। परंपरा के नष्ट होने से नास्तिकता नष्ट हो जाएगी, ऐसा मुझे नहीं लगता। हो सकता है कि परंपरा के रहते नास्तिकों की संख्या कुछ ज़्यादा होती। पर ऐसे नास्तिक परंपरा से आए आस्तिकों की तरह ही रुढ़ और हठधर्मी होते। जिस तरह हम देखते हैं कि कई बार राजनीतिक पार्टियों के संपर्क में आने से नास्तिक हो गए लोग घटना-विशेष की प्रतिक्रिया में ठीक कट्टरपंथिओं जैसा ही आचरण करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि चूंकि हम यह आचरण घोषित कट्टरपंथियों के विरोध में कर रहे हैं इसलिए यह कट्टरपंथ नहीं, हमारी ‘वैचारिक प्रतिबद्धता’ है।

दोस्त लोग मानते हैं कि नास्तिकता किसी तरह घिसट-घिसट कर जीवित है। ऐसा शायद वे संख्या और सांसरिक/भौतिक सफ़लताओं के आधार पर तय कर लेते है। यही लोग ख़ुदको अघ्यात्मवादी भी मानते हैं। संख्या बल और भौतिक सफलता को मानक बनाएं तो इंसानियत भी एक अप्रासंगिक शय हो चुकी है और इसे भी दफ़ना देना चाहिए। और अगर आप सफ़लताओं की वजह से आस्तिकता के साथ हैं तो इसका एक मतलब यह भी है कि आप उस विचार और सही-ग़लत की वजह से कम और अपने फ़ायदे की वजह से उसके साथ ज़्यादा हैं। कलको आपको नास्तिकता में सांसरिक फ़ायदे दिखेंगे तो आप उसके गले में हाथ डाल देंगे। अगर नास्तिकता घिसटकर चल रही है और इस वजह से अप्रासंगिक है तो भैया सारी क्रांतियां और स्वतंत्रता आंदोलन भी कभी न कभी घिसटते ही हैं। घिसटने से इतना डरना या उसे हेय दृष्टि से क्यों देखना !? दलितों, अश्वेतों और महिलाओं के आंदोलन भी तो सैकड़ों सालों से घिसट ही रहे थे। आज किसी अंजाम पर पहुंचते भी तो दिख रहे हैं।

--संजय ग्रोवर

87 comments:

  1. हाँ सर वास्तविक वजह यही होती है..नास्तिकता आदमीं को जिम्मेदार बनती है अपने और समाज दोने के लिए...
    जब की लोग जिम्मेदारी से भागते हैं क्यों की इसमें उनका फायदा है..कुछ गलत हुवा तो कह सकें खुदा की यही मर्जी थी...और अपना पल्ला आसानी से झड सकें

    ReplyDelete
  2. नास्तिकों के ब्लॉग की शुरुकत आपके पोस्ट से हुई .....मुबारक कदम हो ये सर ....हम सबके लिए.पहला कदम सच में उठाना बहुत मुश्किल का है सभी एक दुसरे को देख रहे थे देखें कोंन पहले लिखता है....

    ReplyDelete
  3. मैं नहीं मानता की नास्तिकता स्वाभाविक है. बल्कि आस्तिकता स्वाभाविक है, जब हम कोई मशीन चलती हुई देखते हैं तो फ़ौरन दिमाग में विचार आता है की इसे किसी ने बनाया है. इसी तरह जब हम पूरे विश्व को चलता हुआ देखते हैं तो क्या यह विचार नहीं आना चाहिए की इसे किसी ने बनाया है?

    ReplyDelete
  4. ओह जीशान जैदी जी, आप विश्व को किसने बनाया का प्रश्न करते हैं तो क्या आपके दिमाग में ईश्वर को किसने बनाया का प्रश्न नहीं आता?

    ईश्वर की उत्पत्ति हमने स्वयं अपने भय और कमजोरी से की है.

    ReplyDelete
    Replies
    1. Dharm aur iswar dono juda hai, dharm ka iswar se koi sambandh nahi hai. Nastik asal me Iswar par prhaar nahi karte we dharm ki khokhli baato me uljhe rahate hai man ko sant kijiye ankh moond ke jara "o mere jeevan ke beej " panch minat kah ke dekhiye

      Delete
  5. look..... some body is there who helps us.... that is god..and.......I dont have words to explain the things .....but GOD IS THERE...

    ReplyDelete
  6. समझ के साथ नास्तिक होना ही नास्तिक होना है। वरना श्रद्धावत नास्तिक होना तो आस्तिक होना ही है।
    आखिर ब्लाग का शुभारंभ हुआ। हम भी इस की प्रतीक्षा में ही थे।

    ReplyDelete
  7. संजय जी, ये बात जो आज आप कह रहे हैं कि आप जब नास्तिक हुये तो किसी वाद से प्रभावित होकर नहीं हुये, ये तर्कशील बुद्धि से उपजा आपका स्वयं का विश्वास था, यही बात मेरे पिताजी के साथ भी थी. उन्होंने जिस माहौल में जन्म लिया था, उसमें भक्ति, अन्धविश्वास और कुरीतियों का बोलबाला था, पर उन्होंने हर बात को तर्क की कसौटी पर कसकर देखा और एक-एक करके उन्हें खारिज करते गये...
    मैंने उनकी बेटी होते हुये भी अपना खुद का रास्ता चुना, मैं ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करती थी...पर धीरे-धीरे मुझे लगा कि ये मेरे तर्क में कहीं भी खरा नहीं उतरता है...आज मैं कह सकती हूँ कि मैं गैरधार्मिक हूँ क्योंकि मेरी किसी भी धर्म में कोई आस्था नहीं है.
    धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा और नफ़रत ने धर्म से मोहभंग तो बहुत पहले कर दिया था...पर किसी भावना में बहकर कोई विश्वास अपनाना ठीक नहीं होता...इसलिये सोच समझकर लिया हुआ निर्णय है ये.

    ReplyDelete
  8. नास्तकिता और आस्तिकता दोनों ही असहज हैं -बस केवल सहजता ही सहज है .नास्तिकता की सीधी चढ़ कर ही आस्तिकता की ऊंचाईयों तक पहुंचा जा सकता है -आस्तिकता अनिवार्यतः पोंगा पंथी होना नहीं है !मैं इश्वर को नहीं मानता मगर मंदिर जाना चाहता हूँ क्योकि वह मेरी संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा है!

    ReplyDelete
  9. .
    .
    .
    मेरी समझ में जहां तर्क, विवेक, विचार, मौलिकता और वैज्ञानिकता है वहां कभी न कभी नास्तिकता आ ही जाएगी। चाहे ऐसी कोई परंपरा हो न हो।

    सत्य वचन देव, वाकई प्रत्येक स्थिति में तर्क, विवेक, विचार, मौलिकता और वैज्ञानिकता को सर्वोपरि मानने व आस्था-विश्वास आदि पूर्वागृहों से मुक्त हो अपनी अकल लगाने पर जो निष्कर्ष निकलेंगे उन्हें 'नास्तिकता' कहती है दुनिया ।

    पर 'नास्तिक' शब्द का कोई बेहतर विकल्प होना चाहिये क्योंकि यह शब्द 'जिस' के नकार को प्रतिध्वनित करता है 'वह' है ही नहीं, यही 'नास्तिक' कहते हैं... जैसे 'एलोपैथी' जो 'होमियोपैथी' का विलोम है की जगह आधुनिक चिकित्सा प्रणाली को आज Modern Evidence Based Medicine कहते हैं इसी तरह Modern evidence & logic based beliefs के लिये एक बेहतर शब्द की दरकार है।

    ReplyDelete
  10. हार्दिक शुभकामनायें !

    ReplyDelete
  11. ज़ीशान जी, अगर यह बात भी दिमाग में याये भी तो इसका उत्तर ईश्वर कैसे होगा? बहूत पहले भारत में परम्परा में कुछ प्रश्न पूछे गये- यदि मान भी ले कि इश्वर कि उत्पत्ति नही जन सकते तो भी उसने यह तथाकथित रचना कैसे की, क्या ’कच्चा माल’ था? यदि कुछ था तो उसे किसने बनाया? फ़िर तो वह अधिक शक्तिशाली हुआ and so on...

    ReplyDelete
  12. @Rakesh Ji & sudha Ji
    ईश्वर अर्थात absolute creator अर्थात वह जिसने सभी की रचना की. इसलिए उसने अगर सृष्टि की रचना की तो उसके कच्चे माल की भी रचना की. अब सवाल उठता है की उसकी रचना किसने की तो जवाब यह है की अगर कोई absolute creator है तो वह स्वेयें का भी creator होगा. वरना फिर वह absolute creator नहीं रह जाएगा.

    ReplyDelete
    Replies
    1. साथ ही अगर कोई absolute creator है भी तो केवल पृथ्वी गृह पर ही इतने सारे धर्म क्यूँ हैं? क्या उस absolute creator मे इतनी शक्ति नही है की सबको बनाने के बाद एक भी करता और सबका पालन भी करता. अगर मान भी लें की भगवान है और उसी ने सबको बनाया है तो वो एक बहुत की बुरा अभिभावक हुआ, क्यूँ है की नही?

      Delete
  13. .
    .
    .
    @ zeashan zaidi,

    Hmmmmm...
    Absolute Creator अर्थात ईश्वर,

    अब जब इनके होने के बारे में आपके इस Absolute Confidence पर पूछा जायेगा तो आप किसी 'धर्मग्रंथ' का हवाला दे दोगे... तर्क व तथ्य के आधार पर बात करिये श्रीमान...कृपया...

    आइये जानते हैं कि यह Absolute Creator है कौन, है भी या नहीं ???

    आभार!

    ReplyDelete
  14. @ zeashan zaidi,
    मेरे लिए यह अत्यंत दुर्लभ जानकारी है कि एबसोल्यूट क्रिएटर स्वयं को भी क्रिएट करता है। इसे अगर आप विस्तार से बताएं तो बहुतों को लाभ होगा। कुछ क्रिएट करने के लिए शायद ज़रुरी है कि क्रिएटर पहले से मौजूद हो। और अगर वह पहले से मौजूद है तो उसे फिर से खुदको क्रिएट करने की ज़रुरत क्या है?

    ReplyDelete
  15. ब्लौगर बंधु, हिंदी में हजारों ब्लौग बन चुके हैं और एग्रीगेटरों द्वारा रोज़ सैकड़ों पोस्टें दिखाई जा रही हैं. लेकिन इनमें से कितनी पोस्टें वाकई पढने लायक हैं?
    हिंदीब्लौगजगत हिंदी के अच्छे ब्लौगों की उत्तम प्रविष्टियों को एक स्थान पर बिना किसी पसंद-नापसंद के संकलित करने का एक मानवीय प्रयास है.
    हिंदीब्लौगजगत में किसी ब्लौग को शामिल करने का एकमात्र आधार उसका सुरूचिपूर्ण और पठनीय होना है.
    कृपया हिंदीब्लौगजगत देखिए

    ReplyDelete
  16. अच्छी शुरूआत हुई...

    ReplyDelete
  17. @Arvind Mishra
    '.नास्तिकता की सीधी चढ़ कर ही आस्तिकता की ऊंचाईयों तक पहुंचा जा सकता है ' - शत प्रतिशत सहमत!
    @Praveen Shah
    मैं फिलहाल तो तर्कों के आधार पर ही बात कर रहा हूँ. अब ये बताएं की मेरे तर्क के ऊपर आपकी क्या राय है?
    @Sanjay Grover
    मैंने यह कहा की 'अगर कोई absolute creator है तो वह स्वेयें का भी creator होगा.' यह नहीं कहा की 'उसने खुद को क्रियेट वास्तव में किया है.'
    इसका मतलब 'absolute creator' के बारे में दो संभावनाएं बनती हैं,
    १. पहली ये की अगर वह कभी क्रियेट हुआ तो खुद उसी ने स्वयें को क्रियेट किया.'
    २. दूसरी ये की वह कभी भी क्रियेट नहीं हुआ, वह सदेव से जैसा है वैसा ही रहा.

    ReplyDelete
  18. बड़ी देर कर दी मैंने शायद!
    मैंने आस्तिकता और नास्तिकता दोनों को करीब से देखने की कोशिश की है! शायद मै एक निहायत नालायक इंसान हूँ जिसकी वजह से ना तो सही तरीके से आस्तिक हो सका ना पुर्णतः नास्तिक हूँ! आस्तिकता और नास्तिकता जब जिद बन जाए तो समस्या बन जाती है सो मैंने अपनी पतंग को ढील देदी है! जो मन आये सो करो या मत करो! सच कहूँ तो किसी भी बंधन में बंधना आपकी उस व्यवस्था में आस्था का प्रतिक है और आस्था आस्तिकता की जननी है! सो स्वय को नास्तिक घोषित करते हुए अक्सर हम नास्तिक विचारों में अपनी आस्था दिखा जाते हैं! नास्तिकों का आस्तिकों से यही प्रश्न होता है की आखिर इश्वर है क्या? और वो है की नहीं है ? सिद्ध करने की होड़ होती है, एक की आस्था है की वो है दुसरे की आस्था है की नहीं है! या यूँ कहें की तर्क में आस्था रखने वाले नास्तिक और अध्यात्म या समर्पण में आस्था रखने वाले आस्तिक (आजकल परिभाषा में बदलाव करने की ज़रूरत है दूसरों की आस्था पर हमला कर अपनी आस्था का बखान करने या दूसरों की आस्था में खोट निकालने वाले आस्तिक) मगर आस्था दोनों के पास है!
    यहाँ अपने पास ऐसा कुछ नहीं है या नहीं है की बहस में उलझना बेकार सा लगता है! अगर इश्वर निकाल आया तो कह्देंगे "नमस्ते ताऊ कैसे हो और क्या चल रहा है" नहीं आया तो कौन सा आसमान टूट पड़ेगा! आखिर उस इश्वर (जो है भी और नहीं भी) कौनसा मेरा या दुनिया का भला किया है!
    और सवाल की आखिर रचना किसने की तो भाई मैंने नहीं की और जिसने की है वो सामने आके बताये की उसने की! मैं भी लगे हाथ सवाल करने के मुड में हूँ की भाई जब संभालना नहीं था तो रचना क्यों की

    ReplyDelete
    Replies
    1. शफीक रहमान साहब...( नाम को अपनी सुविधा के लिए छोटा करने की गुस्ताखी कर रहा हूँ)...बहुत अच्छा तर्क ....लाज़बाव

      Delete
  19. सिर्फ तार्किक बात:

    1. The concept of 'Absolute Creator' stands on unfound grounds. If one can believe in an absolute creator, it is not any harder to believe in an absolute creation (creation that has been in existence since forever / creation that was formed on its own).

    2. One cannot claim on the one hand that the world needs a creator and extend that chain of logic to prove the existence of God, and then negate that God needs a creator. If God does not need a creator, then by the same branch of logic the world does not need a creator.

    3. There is not one, single piece of evidence that there is an all-powerful God who wants us to a) dress in a certain manner, b) eat in a certain manner, c) behave in a certain manner, d) pray to him from time to time, e) observe specific rituals.

    While...

    There is evidence all around the world that there is no God. Or if there is one he is: a) not all-powerful, b) not omni-present, c) does not care enough for the world, d) away on a holiday, e) has left us alone, in which case he isn't listening to your prayers anyway.

    There is also not a single piece of evidence in support of heaven or hell, except the fact that we've made this earth pretty hellish all by ourselves

    I've been an atheist all my life. The only times I went to a religious building was because the demands of family/society could not be avoided.

    I have been through all kinds of crisis, personal and otherwise, but I have never felt that thinking about God has helped in any manner.

    Congratulations to Sanjay Grover for creating a blog for atheists, because usually atheists are busy minding their own business, and since they couldn't care to create more non-followers, they don't publicize their views like non-atheists do.

    ReplyDelete
  20. अच्छी शुरुवात.

    ReplyDelete
  21. @Cyril Gupta,
    इस तार्किक विवेचन के लिए आपका बहुत-बहुत आभार। यह ब्लाग सभी मित्रों का सम्मिलित प्रयास है। दूसरे सदस्यों की तरह मैं भी इसका एक सदस्य मात्र हूं।

    ReplyDelete
  22. @Cyril Gupta
    About 1 & 2.
    कम से कम ऐसा कोई absolute creation हमारे आसपास नहीं दिखाई देता.बल्कि किसी भी क्रियेशन का कोई न कोई कारण हमेशा दिखाई देता है.भले ही वह कारण Physical Laws हों. और इसीलिये यह मानने का कोई आधार नहीं की पूरे यूनिवर्स क्रियेशन का कोई कारण नहीं, और जहां बात आती है कारण की तो 'क्रियेटर' अपने आप तर्क में जुड़ जाता है. हाँ यह माना जा सकता है की क्रियेटर की तरह क्रियेशन की प्रोसेस भी forever है. अब क्रियेशन की इस प्रोसेस के लिए दो संभावनाएं हैं.
    1. Without Creator : तो फिर यह प्रोसेस रैंडम होगी.
    2. With Creator : तो फिर यह प्रोसेस Well Ordered होगी.
    लेकिन यह प्रोसेस रैंडम तो नहीं दिखाई देती. क्योंकि यूनिवर्स क्रियेशन में वही घटनाएं होती हुई दिखाई देती हैं जिनके होने की Probability सबसे कम थी. मिसाल के तौर पर एटम का बनना. अगर electron, proton aur neutron से एटम बना तो होना ये चाहिए था की ये सब एक दूसरे से जुड़कर ठोस हो जाते, या फिर electrons & protons जोड़ों की शक्ल में यूनिवर्स में बिखरे होते, या फिर एटम के विविध रूपं यूनवर्स में दिखाई देते. लेकिन ऐसा नहीं है. एटम का वही रूप (With Fine Tuning) यूनिवर्स में दिख रहा है जिसके बनने की संभावना सबसे कम थी.
    अब बात करते हैं क्रिएटर्स की चेन की, तो वास्तव में ऐसी कोई चेन दिखती नहीं है. विश्व में हर जगह क्रियेशन तो दिखाई देता है लेकिन क्रियेटर नहीं. अब इस क्रियेशन की Uniformity संकेत देती है की क्रियेटर एक ही है. अगर यह माना जाए की उस God का भी कोई God है तो उसका एविडेंस कहीं न कहीं दिखाई या सुनाई पड़ना चाहिए. लेकिन पूरी दुनिया में बस यही सुनाई पड़ता है की ईश्वर एक है.
    3. लेकिन नेचर में इसी तरह का एविडेंस सबसे ज्यादा दिखाई देता है. हर जानवर, कीड़े मकोड़े को पता है की उसे क्या खाना है, कैसे बिहेव करना है. हाँ उनकी प्रेयर के बारे में हमें नहीं पता क्योंकि हम उनकी भाषा नहीं समझते.
    "There is also not a single piece of evidence in support of heaven or hell, except the fact that we've made this earth pretty hellish all by ourselves"
    अगर heaven or hell इस लाइफ में दिखाई दे रही है तो नेक्स्ट लाइफ में इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. हम इस पृथ्वी के बारे में भी दावे से नहीं कह सकते की इसके १००% रहस्य मालूम हो गए हैं, तो आफ्टर डेथ क्या होगा हम कैसे बता सकते हैं?
    Thanks!

    ReplyDelete
  23. We have such a big universe which has trillions of galaxies. each galaxy has trillions of stars. Well, we have not yet been able to figure out our own solar system. Who can be creator of such a mammoth universe. Even in my childhood, I grew with this inquisitiveness. But my family never allowed me to be natural with my belief or disbelief. Thence, like billions I took refuge in God. But today when I know that there is no god to answer my queries why to believe in him. Why can't we chuck him like other rituals? And this debate is futile over creation. It's also futile to debate about where do we go after death. with composition and decomposition, creation or destruction becomes a natural process without involving any role of supernal power. it's very simple. Why can't others understand this?

    ReplyDelete
  24. No debate is futile because a debate helps in forming opinions, and sometimes in changing them. I think a healthy debate on any and every topic should be encouraged, but an unhealthy debate should be avoided. What is a healthy debate? One in which people have respect for the person, but not for the topic (What I mean is, treat your opponent with respect, but don't let that come into your way of decimating the wrong views that he may hold).

    If Zeashan or anyone else is ready for a healthy debate, I am ready to be a participant. But let that not be in light of any religious scripture (let's talk logic and science).

    1. Absolute Creationism - It is all around us. In fact everything we witness is formed by absolute creation (as you call it). We only change the form of what we have, we do not create. So you cannot extend what we do to create tools, machines, etc. to apply to the universe. The universe gives us the tools and the raw material to create. But the universe or matter itself can be said to be formed on its own just as a god can be said to be born on its own.

    2. Without Creator - If Order implies a creator than since God is orderful he must have a creator. How can you prove otherwise?

    3. Probability - According to the chaos theory nothing is improbable given an infinite timescale. That is to say, if the timescale is infinite even an improbable event may occur. Thus a God can be born on its own (as you claim), or the universe can be born on its own.

    One cannot claim that the universe (atoms) were brought in order by a God who exists in a realm that is not a part of this existence. If the electrons or protons, or neutrons are in order that does not imply that somebody brought them into order. They could be order just because that's the way of the things (or we may discover the true reason later), not because they were created by God.

    Uniformity - Please clarify in what way is this creation Uniform. I see diversity everywhere. What is the uniform chain? There are distinct races of living beings and different kinds of matters that are formed by the same basic unit (an atom).

    We can probably say that the universe is composed of one basic building block, but that authenticates the big-bang theory which says that all matter was compressed into an infinite point at the beginning of time.

    -- I don't know what you mean by next life. An atheist may not believe in next life or continued existence.

    You're right to say that one cannot deny the possibility of a next life, but that's equivalent to saying that one cannot deny the possibility of not having a next life.

    Last point: Just because we are ignorant of how some things work, it doesn't make it logical to accept the existence of a supreme creator. That's a very savage kind of attitude. If you leave a record player in the midst of untouched savages, they'd think it's a gift from God. How are we behaving any different if we accept God only on the evidence that we don't know enough.

    Since you agree that we do not know what will happen after death, how can you actually subscribe to any organized religion that claims to tell you how your after life is going to be?

    ReplyDelete
    Replies
    1. All are valid points. I appreciate your logical approach

      Delete
  25. इश्वर मानव की सबसे बडी‌ खोज व भूल है। ९० प्रतिशत आबादी उस वस्तु मे विश्वास करती है जिसने उसे देखा तक नही। मानव मे अपने समाज पर अधिकार पाने की लालसा होती ही है, येन केन प्रकरेण। इश्वर की खोज भी बाकी बेबसों पर राज्य करने की चेष्ठा है। इश्वर की खोज उस समय आवश्यज थी जब प्राकृतिक घटनायें औरन् उनके कारण अज्ञात थे। अपनी समझे के आधार पर व्याख्या व जीवन के नियम तय किये गये। विज्ञान के सहारे जैसे जैसे चीजें‌ स्पष्ट होती‌ गयी नियम और समझ बदलते गये -- लेकिन अमनी हुकूमत कायम रखने हो धार्मित नेताओं ने नियम नही बदले वरन आधुनिक ज्ञान के आधार पर उनको संशोधित कर दिया। राज्य कायम रहे। धर्म परिवर्तन, धारमिक दतभेदत, युद्द, स्त्रियो से भेद भाव -- इस्लाम मे बुरके मे ढक देने की परंपरा -- सब शोषण है। इस्वर ने सबसे ज्यादा जाने लीं‌ हैं। 'मानव' ने हमेशा संधि की चेष्ठा की है। जिस दिन हम इश्वर की बजाये मानव ने आस्था स्थापित कर लेंगे। विश्व की सारी साम्स्या समाप्त हो जायेगी।

    शायद १००० हजार साल बाद।
    ग्रोवर जी, नीग्रो शब्द अपमान जनह है कॄपया अश्वेत कर दें।

    उम्दा प्रस्तुति -- स्वपनिल भारतीय
    सम्पादक
    कटोडा
    कल्किआन
    कल्किआन हिंदी

    ReplyDelete
  26. Zeashan, if you do believe that there has to be a 'creator' then I would agree with you IFF you can tell who is the creator of 'God' because there has to be a creator of everything :-)

    Going by "creationists" approach, God can not exist without a creator. Who created the intelligent design called God?

    ReplyDelete
  27. नास्तिक भी हुआ जाता है !
    .
    "नास्तिकता तो ख़ुद ही परंपरा के खि़लाफ़ एक विचार है"
    याने जहाँ कोई परंपरा नहीं है वहाँ नास्तिक नहीं हो सकता , क्योंकि जहाँ आधार ही नहीं वहाँ विरोध किसका ख़िलाफ़त किसकी ?
    मतलब नास्तिकता बिना परंपरा के अस्तित्व में नहीं हो सकती

    ReplyDelete
  28. नास्तिकता परंपरा का विरोध नहीं, परंपरा का न होना है. सोचिये अगर कोई परंपरा न हो तो जो बचेगा वही नास्तिकता है. आप उसका मूर्त रूप परंपरा के विरोध में देखते हैं क्योंकि परंपरा होने की वजह से विरोध होता है. अगर परंपरा नहीं होती तो विरोध भी नहीं होता.

    अगर किसी बच्चे को बगैर परंपरा के पाला जाये तो वह एक नास्तिक का जीवन जियेगा. लेकिन बिना परंपरा को बारंबार थोपे, समझाये, सिखलाये आस्तिक नहीं बनाया जा सकता. इसलिये हर धर्म मे जोर repetition पर है.

    इसलिए यह माना जा सकता है कि नास्तिकता प्राकृतिक है (सभी जानवर नास्तिक होते हैं), व नास्तिकता स्वत: स्फूर्त: है. धर्म व ईश्वर की अवधारणा गैर-प्राकृतिक है, व मानव निर्मित है.

    ReplyDelete
  29. @डॉ महेश सिन्हा,
    नास्तिकता एक विचार है और विचार परंपरा के बिना भी होते हैं और परंपरा की प्रतिक्रिया में भी। विचार के बिना परंपरा पैदा नहीं होती। परंपरा से विचार पैदा हो कोई ज़रुरी नहीं बल्कि एक स्तर पर जाकर परंपरा विचारों में बाधक बनने लगती है जब लोग ‘हमारी तो यही परंपरा है, हम तो यही करेंगे’ के फेर में पड़कर सही-ग़लत देखना बंद कर देते हैं।
    @Swapnil Bhartiya,
    अश्वेत कर दिया है। शुक्रिया।

    ReplyDelete
  30. @ संजय ग्रोवर
    नास्तिक शब्द पर ध्यान दें
    यह आस्तिक के सामने न याने नकारात्मक जोड़ कर बना है . याने नास्तिक का धरातल बिना आस्तिक के है ही नहीं .
    यह मैं नहीं शब्द विन्यास कह रहा है .

    ReplyDelete
  31. आस्तिक शब्द पर ध्यान दें। यह नास्तिक में से ’न’ हटाकर बना है।

    असल में यह जवाब देना ज़रुरी नहीं था। बहस किसी भी स्तर पर जारी रखी जा सकती है। लेकिन जब हम मुद्दे से हटकर शब्दों से खेलने लगते हैं या ख़ामख्वाह ही अणु-परमाणुओं की परिभाषाएं उद्धृत करने लगते हैं तो इससे हमारी विद्वता का प्रदर्शन तो होता है मगर बहस अपने अर्थ खो देती है।

    ReplyDelete
  32. :) There are 100 ways to argue the same argument. Why should any one way be perfect?

    ReplyDelete
  33. @Cyril Gupta
    आपने मज़ाक में कही लेकिन बात गंभीर है। शायद इसीलिए आज तक
    तर्क-कुतर्क की परिभाषाएं नहीं बन सकीं। दूसरे हमारे यहां बहस की नहीं, शास्त्रार्थ की परंपरा रही जिसमें आपको अपने नहीं शास्त्रों में लिखे विचार, तर्क के रुप में प्रस्तुत करने होते थे। शास्त्रों की जगह अब कुछ दूसरी क़िताबें लेने लगी हैं। छपे हुए शब्द को यहां स्वयंसिद्ध समझा जाता है, इसलिए उसे धड़ल्ले से प्रस्तुत कर दिया जाता है और उसे सिद्ध करने की कोई ज़रुरत नहीं समझी जाती।

    ReplyDelete
  34. किसी शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई .इससे उसके इतिहास का पता चलता है . मेरी जानकारी तो यही कहती है की नास्तिक , आस्तिक में न जोड़कर बना है . शब्द इसी प्रकार बनाये जाते हैं . नास्तिक याने जो आस्तिक का विरोधी या नकारता है .
    अगर आस्तिक ही नहीं होता तो न नास्तिकता होती न नास्तिक क्योंकि तब यह शब्द ही नहीं होता न इसका कोई महत्व . एक के लिए दूसरे का होना जरूरी है .
    नास्तिक का अपना खुद का धरातल या विचार क्या होता है ?
    नास्तिक एक ऐसा समूह है जो अपने को बाकी समाज और लोगों से अलग और ऊपर देखता है .
    तर्क और कुतर्क में बहुत पतली सीमा है .
    मान लिया जाए की आस्तिक के पास प्रश्नो के उत्तर नहीं हैं क्या नास्तिक के पास सारे प्रश्नो के उत्तर हैं .आस्था और अंधविश्वास के बीच की सीमा रेखा बहुत पतली है .

    ReplyDelete
  35. Cyril Gupta ने मजाक में ही सही बात सही कही है

    ReplyDelete
  36. हर बच्चा जन्म से नास्तिक ही होता है। धर्म, ईश्वर और आस्तिकता से उसका परिचय इस दुनिया में आने के बाद कराया जाता है, इसी दुनिया के कुछ लोगों द्वारा। कल्पना कीजिए कि इस पृथ्वी पर कोई ऐसी जगह है जहां ईश्वर का नामो-निशान तक नहीं है। ईश्वर की कोई ख़बर तक उस देश में कहीं से नहीं आती। कोई मां-बाप, रिश्तेदार, पड़ोसी, समाज, बड़े होते बच्चों को ईश्वर की कैसी भी जानकारी देने में असमर्थ हैं, क्योंकि उन्हें ख़ुद ही नहीं पता। क़िस्सों और क़िताबों में ईश्वर का कोई ज़िक्र तक नहीं है। तब भी क्या वहां ईश्वर/आस्तिक के अस्तित्व या जन्म की कोई संभावना हो सकती है !? wo bhi aaj ki paristhitiyoN me. Jab manushya agyani tha aur hawa, pani,aag aadi se dar kar unme Ishwar ki kalpna kar leta tha. Aaj to vah bahut si batoN ke vaigyanik karan jaanta hai.

    ReplyDelete
  37. @ dear all

    मेरे विचार से शब्द "नास्तिकता" को आस्तिक विचार का शब्द मानना चाहिए! नास्तिकता सही मायने में स्वछंदता है! और किसी भी पहचान (Identity) से नहीं जुडती यहाँ तक किसी क्षेत्र और किसी भी प्रकार की समुहवादी भावना स्वछंदता के विरुद्ध जाती है! किसी भी नास्तिक धारा और परंपरा का पालन करने वाले विचार-विशेष के अनुयायी तो हो सकते हैं परन्तु नास्तिक (स्वछन्द) नहीं! नास्तिक विचार आपके बंद कमरे में अकेले में शुरू होता है और सदैव ही अकेला रहता है! नास्तिकता आच्छी बुराई सही गलत से भी परे है! मेरी नज़रो में ये सामाजिक सत्ता अथवा किसी भी प्रकार की संगठनात्मक सत्ता अथवा व्यवस्था को चुनौती है! इसलिए किसी भी समूह से जोड़ देना स्वछन्द आचरण के विरुद्ध होगा!

    ReplyDelete
  38. क्या विज्ञान के पास हर सवाल का जवाब है ? नहीं .
    तो यह पूर्ण कैसे हो गया . विज्ञान यह भी मानता है की वस्तुएं परिवर्तित होती हैं नष्ट नहीं .
    जो इंसान को दिखाई भी नहीं देता ऐसे छोटे से कण अणु और परमाणु में इतनी शक्ति कहाँ से आती है .

    ऐसा लिखा गया है की कल्पना कीजिये एक ऐसे स्थान की जहाँ आस्तिकता नाम का जीव "नहीं" होता तो जो होता वह नास्तिकता होती .लेकिन ऐसा कहीं हुआ क्या ? अगर हाँ तो कहाँ और नहीं तो यह केवल एक काल्पनिक स्वप्न ही है .

    ReplyDelete
  39. किसी के पास सारे प्रश्न हों, यही संभव नहीं है, उत्तर तो बाद की बात है।
    विज्ञान के पास सारे उत्तर हैं, ऐसा दावा किसने किया ? हां. कल जिन बहुत से सवालों पर विज्ञान को निरुत्तर समझा जाता था, आज उनमें से कईयों के उत्तर वह दे चुका। इसी आधार पर माना जाता है आगे भी बहुत से प्रश्न वह हल कर लेगा।
    इंसान शुरु से आस्तिक था या नास्तिक, ऐसे कोई सबूत न मेरे पास हैं न आपके पास। लेकिन मैं अपने अनुभव से जानता हूं कि बच्चे में ईश्वर और आस्तिकता संबंधी सारे विचार, पैदा होने के बाद डाले जाते हैं। यही मेरी बात का मर्म है।
    शफ़ीकुर्ररहमान जी से काफी हद तक सहमति है।

    ReplyDelete
  40. विज्ञान खोज करता है . उस चीज की जो विद्यमान है . यह विज्ञान की कमी है अगर उसे कोई बात नहीं मालूम है . यह उस बात की गलती नहीं कही जा सकती जिसे विज्ञान नहीं जानता .
    मुझे किसी ने आस्तिक होने के पाठ नहीं पढ़ाये न परिवार वालों न किसी और ने . मैं भी सारी बातें जिसे आप आस्तिक कहते हैं का विरोधी था . कहा जा सकता है की मैं नास्तिक था .

    मुझे मेरे स्वयं के अनुभव ने विश्वास करना सिखाया.इस विश्वास की पुनरावृत्ति किसी वैज्ञानिक तरीके से नहीं की जा सकती . मैं प्रारंभ से विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ .

    ReplyDelete
  41. बुरा न माने तो नास्तिकों का न समूह हो सकता है न ही ब्लाग
    धन्यवाद

    ReplyDelete
  42. @Cyril Gupta
    मैं केवल लोजिक और साइंस पर ही बात करूंगा.
    In reply to :
    1. Absolute Creationism - It is all around us........
    Absolute Creation उसे कहेंगे जहां 'कुछ नहीं' से 'कुछ' क्रियेट हो जाए. और इस तरह का क्रियेशन करने वाले को Absolute Creator कहा जाएगा. जैसे की matter from energy or energy from matter. मनुष्य या कोई भी प्राणी Absolute Creator नहीं है. बल्कि क्रियेटर भी नहीं है जैसा की आपने कहा की सब कुछ पहले से उपलब्ध है, हम सिर्फ उसे जोड़ देते हैं, और उसके लिए भी कुदरत (या ईश्वर) ने हमारे सामने पहले से नमूने उपलब्ध कर रखे हैं. क्रियेटर तो कोई तभी होगा जब उसके सामने कोई नमूना न हो और वह कोई चीज़ तय्यार कर दे. दूसरी बात जब मनुष्य कोई चीज़ तैयार करता है तो इसलिए क्योंकि कुदरत ने उसे हर औज़ार उपलब्ध करा दिया है, साइंटिस्ट पोलिथीन इसलिए बना सका क्योंकि कार्बन इत्यादि के परमाणुओं में जुड़कर चेन बनाने की क्षमता थी. इसका मतलब कुदरत में (या उसके बनाने वाले) में थिंकिंग पावर थी की उसने ऐसे टूल्स बनाए जिसका इस्तेमाल करते हुए मनुष्य अपने काम की चीजें बना सके.
    2. Without Creator - If Order implies a creator than since God is orderful he must have a creator. How can you prove otherwise?
    यहाँ पर किसी चेन या आर्डर की बात नहीं है, बस दो ही चीज़ें हैं, क्रिएशन और क्रियेटर. अगर मैं ये कहूं की क्रियेशन में एक चीज़ दूसरे को क्रियेट कर रही है तो फिर हर क्रियेटर (including God) के लिए किसी और क्रियेटर का सवाल उठता है, लेकिन जब कोई ज्ञात चीज़ दूसरे को क्रियेट नहीं कर रही है (एक चीज़ का दूसरी चीज़ के रूप में बदलने का मतलब यह नहीं है की पहली चीज़ दूसरे की क्रियेटर है.) तो फिर क्रियेटर - क्रियेशन की कोई ordered चेन भी नहीं.

    ReplyDelete
  43. 3. ठीक है, लेकिन बिग बैंग थ्योरी के अनुसार यूनिवर्स infinite timescale पर है नहीं. (Age of universe is 20 billion, which is not infinite.) और अगर इसे मान भी लिया जाए की Improbable event हुई तो साथ में probable भी होनी चाहिए. अगर एक एटम में प्रोटोन सेंटर में है और इलेक्ट्रोन चक्कर लगा रहा है, तो कुछ ऐसे भी एटम होने चाहिए जिसमे एलेक्ट्रोंस सेंटर बनाएं और प्रोटोन चक्कर लगाएं, या फिर दोनों एक दूसरे से जुड़कर ठोस एटम बना लें? हर पोसिबिलिटी यूनिवर्स में दिखनी चाहिए.
    Infinite timescale की बात आप तभी कह सकते हैं जब eternal God को मानें. Then According to the chaos theory existence of God is Probable.
    4. Uniformity
    पहली Uniformity ये की हर चीज़ एटम से मिलकर बनी है, और हर एटम स्ट्रक्चर में दूसरे के similar है, living things की बात की जाए तो हर चीज़ का बिल्डिंग ब्लाक समान है यानी की सेल.
    दूसरी Uniformity Macro Universe और Micro Universe में दिखती है, एटामिक स्ट्रक्चर और solar सिस्टम की समानता से आप बखूबी वाकिफ हैं.

    ReplyDelete
  44. @Swapnil
    I am presenting three axioms
    1. Every creation needs a creator
    2. There is one and only one creator that is 'God'
    3. creator does not need any creator because he can create itself.

    ReplyDelete
  45. यह क्रिएटर यानि कि भगवान कभी सामने क्यों नहीं आता !? परेशानी क्या है !? आपको तो आयडिया होगा।

    ReplyDelete
  46. नास्तिकता की अवधारणा पर बहुत बढिया लिखा है । काफी विस्‍तृत र्दा‍शनिक बहस हो गई । ऐसा लगता है कि हर बात के आगे एक बात है ।

    जहॉं तक आस्तिकता और नास्तिकता के आविर्भाव की बात है । तो बच्‍चा प्रारंभ में न तो आस्तिक होता न ही नास्तिक । जो भी होता है , होता है । जैसे मनुष्‍य से इतर अन्‍य जीव । हां , यह जरूर है कि बचपन में आस्तिकता दी जाती है । और बाद में यदि उसने अपने दिमाग का उपयोग किया तो उस सीखे हुए को सही न पाकर , जो हो जाता है, उसके लिए मनुष्‍य को नास्तिक शब्‍द का प्रयोग करना पडता है ।

    क्‍योंकि विधेय के पहले निषेध नहीं हो सकता । अवधारण तो आस्तिकता की ही पहले आई । उसके बाद उसका निषेधात्‍मक पहलू नास्तिकता आई ।

    आस्तिकता से परिचय के पहले मनुष्‍य जो होता है , उसे नास्तिकता नहीं कहा जा सकता । उसे कुछ भी नहीं कहा जा सकता ।

    ReplyDelete
  47. @अर्कजेश,
    आस्तिकता की प्रचलित परिभाषाओं या अर्थों के अनुसार यह किसी ईश्वर की अवधारणा पर टिकी है जो कि हर बच्चे को जन्म के बाद ही दी जाती है। इस अर्थ में हर बच्चा जन्मतः नास्तिक ही है।

    ReplyDelete
  48. एक नास्तिक की जान खतरे में है! घर बैठे कुछ कीजिये लिंक पर क्लिक करके अपना हँसता हुआ अक्षर डाल दीजिये
    http://www.petition.fm/petitions/savearslan/

    ReplyDelete
  49. @संजय ग्रोवर,
    यदि नास्तिकता ईश्‍वर की अवधारणा पर टिकी है तो ईश्‍वर की संकल्‍पना प्राप्‍त करने के पहले कोई नास्तिक कैसे हो सकता है ?

    'ईश्‍वर' नास्तिक के अस्त्तिव के लिए भी उतना ही अनिवार्य है , जितना की आस्तिक के । भले ही नकार की तरह ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. ईश्वर के अस्तित्व से अंजन होना भी एक तरह की नास्तिकता है. उसके लिए ईश्वर की संकल्पना से परिचित होना ज़रूरी नहीं है

      Delete
  50. @अर्कजेश,
    नास्तिकता ईश्वर की अवधारणा पर नहीं टिकी। जब तक बच्चा ईश्वर की अवधारणा से ‘बचा’ रहता है, नास्तिक रहता है। ज़िंदगी भर बचाया जा सके तो जिंदगी भर नास्तिक रह सकता है। ईश्वर की अवधारणा कहां बीच में आएगी जब तक इधर-उधर से उसे बताया न जाए ! ईश्वर की अवधारणा पर टिकी नास्तिकता आप उसे कह सकते हैं जो लोगों को पकी उम्र में आस्तिक से नास्तिक बनाती है। यानि कि एक व्यक्ति जो पारिवारिक संस्कारों से बचपन से आस्तिक है मगर बाद में किन्हीं कारणों से नास्तिक हो जाता है। लेकिन वहां भी ईश्वर की अवधारणा पर टिकी नास्तिकता उसे माना जाना चाहिए जब व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखते हुए उसका विरोध कर रहा हो। अगर ईश्वर के अस्तित्व से ही उसका विश्वास उट गया है फिर भी ऐसा मानना तो ज़्यादती ही है।

    ReplyDelete
  51. 'हॉं' के विकल्‍प के पहले या बगैर 'ना' संभव नहीं है । एक अबोध बच्‍चे को आप नास्तिक नहीं कह सकते , हालांकि उसे आस्तिकता का भी पता नहीं । उसका 'होना' सहज है , लेकिन उसे अपनी सहजता का भी पता नहीं ! इसीलिए सहज है । इस स्थिति के लिए नास्तिक शब्‍द का प्रयोग करना मैं सही नहीं समझता । क्‍योंक इसके शब्‍दार्थ में न+अस्ति है । जो यह बता रहा है कि 'न होने' की अवधारणा के लिए 'होने' की अवधारणा का पता होना जरूरी है ।

    आपकी बात मैं समझ रह रहा हूँ , लेकिन उस स्थिति के लिए इस शब्‍द का प्रयोग मैं नहीं करता ।

    =======

    क्रिये
    टर की अवधारणा से मैं सर्वथा असहमत हूँ । यह सिर्फ तर्क को कुछ दूर तक खींचना भर है । अंतत: जब मानना ही पडता है कि क्रियेटर खुद को भी क्रियेट करता है तो फिर यह तर्क गच्‍चा खाने लगता है । शुरु से प्रकृति को ही ऐसा मान ल‍ीजिए कि स्‍वचालित है।

    ReplyDelete
  52. .
    .
    .
    "पर 'नास्तिक' शब्द का कोई बेहतर विकल्प होना चाहिये क्योंकि यह शब्द 'जिस' के नकार को प्रतिध्वनित करता है 'वह' है ही नहीं, यही 'नास्तिक' कहते हैं... जैसे 'एलोपैथी' जो 'होमियोपैथी' का विलोम है की जगह आधुनिक चिकित्सा प्रणाली को आज Modern Evidence Based Medicine कहते हैं इसी तरह Modern evidence & logic based beliefs के लिये एक बेहतर शब्द की दरकार है।"

    देखिये मैंने जब उपरोक्त टिप्पणी की थी तो जो आशंका मुझे थी, वही हुआ... बहस 'नास्तिक' शब्द, उसके अर्थ व उत्पत्ति आदि पर आ गई और मूल मुद्दा कहीं खो गया!

    धर्म की जड़ें वाकई उतनी ही गहरी हैं जितनी अज्ञान, रूढ़िवादिता, जातीय अभिमान व ज्योतिष, रत्न शास्त्र, टैरो, वास्तु जैसे शास्त्रों की... कोई आश्चर्य नहीं कि यह सब एक दूसरे को पोषित करते हैं!

    ReplyDelete
  53. @अर्कजेश & प्रवीण शाह

    मैं दोनों से सहमत हूं। कल शाम से ही अर्कजेश के कमेंट के संदर्भ में मेरे दिमाग में प्रवीण का पिछला कमेंट घूम रहा था। और अभी देखा तो आप दोनों के ये कमेंट देखने को मिले। वाकई नास्तिक के लिए कोई दूसरा संबोधन सोचना चाहिए।

    ReplyDelete
  54. @Pravin Shah

    allopathy होमियोपथी का विलोम !
    इस पर कुछ प्रकाश डालेंगे

    ReplyDelete
  55. संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
    यह क्रिएटर यानि कि भगवान कभी सामने क्यों नहीं आता !? परेशानी क्या है !? आपको तो आयडिया होगा

    शायद आपकी अवधारणा भगवान के बारे में किसी वस्तु या प्रयोग से है
    विज्ञान के अनुसार यह दुनिया तरंगो का खेल है .
    ध्वनि और प्रकाश की तरंग का एक हिस्सा ही इंसान देख सकता है .
    जो ध्वनि कुत्ते या चमगादड़ को सुनाई देती है वह इंसान को नहीं .इसी तरह उनकी दृष्टि के बारे में भी कहा जाता है
    क्या हर इंसान जो इस दुनिया में है सब कुछ देख सकता है ? आपको सामने कोई वस्तु है जिसे देखने की सीमा आपकी दृष्टि में नहीं है तो उसे आप कैसे देखेंगे .
    विज्ञान की बहुत सी बातें सिद्ध की जाती हैं अप्रत्यक्ष रूप से जैसे आप रेडियो तरंगो को नहीं देख सकते लेकिन मान लेते हैं क्योंकि टीवी और रेडियो जैसे उपकरण हैं . रेडियो आने से पहले यह कपोलकल्पित था की ऐसा भी हो सकता है . आज इस पर कोई प्रश्न नहीं करता .
    यह विज्ञान की खोज करने वालों की कमी है की वे सब कुछ नहीं जानते .
    अगर भगवान आपके सामने भी खड़ा होगा तो आप उसे कैसे देख पायेंगे ?

    ReplyDelete
  56. ईश्वर है या नहीं ? मैं ऐसी किसी बहस में पड़ना अनुचित समझता हूँ। पढ़ता भी नहीं लेकिन इस पोस्ट को पढ़ लिया क्योंकि संजय ग्रोवर ने लिखी थी। मैं पदार्थवादी हूँ। मैं नहीं मानता कि कोई ईश्वर है। यहाँ जितने लोगों ने बहस की है उसमें शफीकुर रहमान खान की बात सबसे सही लगी। अभी इतना ही,शेष फिर कभी।

    ReplyDelete
  57. सीधी बात वह जिसे इश्वर कहा जाता है उसे मनुष्य ने अपनी ज़रूरतों के हिसाब से क्रियेट किया है। और ज़रूरतों के हिसाब से जोड़ा-घटाया है। मैं द्वंद्वात्मक भौतिकवाद में विश्वास रखता हूं और ऐसे किसी परामनवीय शक्ति पर मेरा कोई विश्वास नहीं

    ReplyDelete
  58. यहां कमेंटस् में जिस तरह के प्रश्न उठे हैं उन पर विस्तार से चर्चा मेरे ब्लाग ‘संवादघर’ पर हो चुकी है। लिंक लगा रहा हूं:-

    1. छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां

    http://samwaadghar.blogspot.com/2009/09/blog-post_16.html

    2. क्या ईश्वर मोहल्ले का दादा है !?

    http://samwaadghar.blogspot.com/2009/06/blog-post_16.html

    ReplyDelete
  59. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  60. यहाँ बहुत अच्छी बहस चल रही है... अच्छी लगी ये बहस.
    जो लोग ये कह रहे हैं कि नास्तिकों का कोई समूह नहीं हो सकता उनसे मेरा ये कहना है कि यहाँ इस ब्लॉग से जुड़े लोग कोई समूह नहीं हैं और न सबके विचार एक जैसे हैं. ये स्वतंत्र सोच वाले कुछलोग हैं, जो एक ब्लॉग पर अपनी-अपनी बात लिखेंगे. इन सभी लोगों में बस एक बात कॉमन है कि वे किसी ईश्वर और धर्म में विश्वास नहीं करते हैं. क्यों नहीं करते हैं? उनके क्या तर्क हैं? नास्तिकता को लेकर उनकी सोच कैसी है?... ये सभी बातें सब में अलग-अलग हैं, जैसे मैं खुद को नास्तिक की अपेक्षा गैरधार्मिक कहना अधिक पसंद करती हूँ. गैरधार्मिकता एक विस्तृत अवधारणा है और इसे मान्यता मिलनी चाहिये, मैं इस में विश्वास करती हूँ.

    ReplyDelete
  61. @ मुक्ति
    धर्म क्या है पहले ये तो समझ लें आपके अनुसार . धर्म की भी अलग अलग व्याख्या हैं
    सारे धार्मिक लोग भी एक समूह नहीं हैं

    ReplyDelete
  62. एक अरसे के बाद गुणात्‍मक बहस दिखी ब्‍लॉगजगत पर। पारिभाषिक दृष्टि से खुद को ईश्‍वर निरपेक्ष किस्म का मानते हैं इतना कि ईश्‍वर नहीं है कहना भी उसे भाव देने जैसा लगता है इसलिए नहीं कहते...उसे भी कोई कष्‍ट नहीं इस बात से :), आज तक तो आया नही कहने कि अगर ये नहीं कहता कि ईश्‍वर है तो ये ही कह दूँ कि वह नहीं है... शायद ये स्थिति एग्‍नास्टिक होना कहलाती है।

    मेरी एक सामान्‍य समझ है कि आस्तिक से बहस हो नहीं सकती, नास्तिक-नास्तिक आपस में बहस करेंगे तो बहस असंतुलित होगी।

    एक सामान्‍य सी दार्शनिक समझ ये कि ईश्‍वर के अस्तित्‍व के मामले में 'बर्डन आफ प्रूफ' उनका है जो कहते हैं कि ईश्‍वर है अर्थात 'सिद्ध करो कि ईश्‍वर नही है' एक अवैध वाक्‍य है और जब तक कोई ये सिद्ध न कर दे कि ईश्‍वर का अस्तित्‍व है तब तक ईश्‍वर का अनस्‍ितत्‍व सिद्ध है।

    ReplyDelete
  63. I don't understand that what is the relation between Atheism and god. its negative to say that I am atheist because I don't believe in god. Atheist is one who is so dissolved in inner being that even existence of any thing does not effect his inner soul... doesn't matter if its god itself (eg- Buddha). On this Atheist cite I counted almost in each line "Eshwar" name appears repeatedly with is more than any other religious book's page. All are Atheist and all are talking about god.... Strange but true............
    If you will ask me who is the biggest Atheist in universe..... I can say God is the biggest Atheist.
    Have fun..........

    ReplyDelete
  64. Joke-
    Ek bar ek bahut hi garib vyakti mar rah tha. Us ke parijano ne kaha paise bhi nahi hai pandit ko bula kar puja path ka intzam kaise karenge. Vha vyakti bila chinta kyu karte ho sukra hai bhagwan, mai to ek nastik hu.

    ReplyDelete
  65. दिल्ली में जब काले बंदर का आंतक फैला था तब बहुत से लोगों का अंदाज़ा था कि यह सिर्फ अफ़वाह है। अंत में उसका कोई अस्तित्व सिद्ध भी नहीं हो सका। पर तब भी इस पर कई साहित्यकारों के साक्षात्कार छपे थे। अगर कोई धारणा या अफ़वाह समाज को नुकसान पहुंचा रही है या बहुत से निरपेक्ष लोगों को उस धारणा के चलते सिर्फ इसलिए प्रताड़ित होना पड़ रहा है कि वे उस धारणा में विश्वास नहीं रखते तो वह धारणा या अफ़वाह भले पूरी तरह काल्पनिक हो, उस पर बात तो करनी ही पड़ती है न।

    ReplyDelete
  66. बहुत अच्छा सारगर्भित लेख ।

    ReplyDelete
  67. संजय जी,
    इस लेख पर विचार विमर्श और प्रतिक्रिया और उत्तर-प्रतुत्तर पढ़ गई| आपकी बात सही है कि ''आस्तिकता हम सिखाते हैं, जन्मजात कोई भी आस्तिक नहीं होता|'' आपके लेख को पढ़कर मैं अपनी टिप्पणी लिखने लगी, और फिर प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक लेख लिख गई| अगर आप वक़्त निकाल सकें तो मेरे ब्लॉग पर आयें, ख़ुशी होगी मुझे| आपके उत्तम और तर्कपूर्ण विचार केलिए बधाई आपको| आपके इस लेख केलिए धन्यवाद|
    मेरी नयी पोस्टिंग '' ईश्वर के होने और न होने के बीच...'' पढ़ने केलिए मेरे ब्लॉग पर आयें...
    http://saajha-sansaar.blogspot.com/

    ReplyDelete
  68. एक एक शब्द सार्थक.
    तर्क सब मिथ्या बातों को नष्ट कर सकता है.
    अति उत्तम,स्वागतयोग्य कदम.
    मेरी बहुत बहुत शुभकामनाएँ

    ReplyDelete
  69. # 6 October 2011 at 5:57 pm
    प्राकतिक शक्तियों के सामने असहाय और चकित आदिम मानव द्वारा अपने चारों की घटनाओं और उनके कारणों को जाननें की सहज जिज्ञासा और उनसे भय ने उसे यकीन करा दिया कि इस सबको करने वाला कोई न कोई, कहीं न कहीं तो होना ही चा‍हिए , और इसलिए आपदाओं से बचने के लिए 'उसको' प्रसन्नं रखना जरूरी है। इस आदिम मानव ने 'उसकी' कल्पकना अपने अपने जीवन की परिस्‍िथतियों और पर‍िवेश और अपनी रूप रंग के अनुसार की। इसी कारण से दुनिया की विभिन्न् जातिओं और नस्लोंर के दंवी देवताओं की न केवल शक्लेक बल्कि उनके गुण भी उन्हींप के समान, और उनकी जस्रनतों के अनुरूप होते है। अगर विभिन्नक आदिवासियों और तमाम प्राचीन धर्मों के देवी देवताओं का अध्य यन करें यह बात पूरी तरह से सही साबित होगी। निराकार ईश्वयर की परिकल्प ना मानव इतिहास में बहुत बाद की बात हैं, लेकिन उस ि‍स्थति में उस निराकार के गुण देश काल के अनुसार ही है। मूर्तियां चाहे बुद्ध की हों विष्णु की अथवा ईसा मसीह की प्रत्येमक दंश में इनका चेहरा मोहरा वहां के इनके इनके अनुयायियों जैसा ही बना होता है। अगर ईश्वईर मानव कल्प‍ना की देन नहीं होता तो सूरज,चांद और तारों की तरह, जल और वायु की तरह इसका स्ववरूप इसके गुणधर्म सारी दुनिया में एक समान होने चाहिए थे। पर ऐसा नहीं है। दरअसल इतिहास के एक दौर में जन्मेा वर्ग्ाक समाज के प्रभु वर्ग्ास ने मनुष्य की इस स्‍ाहज और स्वा भाविक कल्पेना का इस्ते माल लोगों को डराने धमकाने और ललचाने के और शोषण करने के एक अस्त्र के रूप में किया, और वो आज तक जारी है। दरअसल धर्म का सबसे बडा पाप आम लोगों को दास बनाए रखने के लिए उनको धर्म के नाम पर आपस में लडातें रहना रहा है। आपस में बैर करना धर्म ही सिखाता है।

    08-10-11

    ReplyDelete
  70. Faith is a need of mind ,without it ,person enters in to depression

    ReplyDelete
  71. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  72. क्या ईश्वर है?
    गणित में किसी बात को सिद्ध करने की एक विधि होती है ‘विरोधाभास विधि’ इसमें हम जिस कथन को सिद्ध करना होता है उसके उल्टा को सही मान लेते हैं अगर विपरीत बात गलत निकलती है तो कथन अपने आप सत्य हो जाता है. तो मानते हैं ईश्वर नहीं है अर्थात जो भी प्रकृति में हो रहा है वो अपने आप हो रहा है , random या स्वतः.
    1. शिशु के जन्म लेते ही माता पयस्विनी हो जाती है अपने आप? अब oxytoxin की कहानी नहीं चलेगी क्योंकि उस हार्मोन में वो शक्ति किसने डाली?
    2. दूध के दांत टूटने के बाद पक्के दांत आते हैं पर पक्के दांत टूटने के बाद नहीं आते क्यों? कैल्शियम तो हम तब भी खाते है?
    3. मस्त्षिक की सरंचना कोई नहीं समझ पाया आज तक neurology अभी शैशवावस्था में है.ये कैसे डाटा स्टोर करता है ,कैसे सर्च करता है,कितनी क्षमता है, जब दिमाग का साइज़ फिक्स है तो उसमें असीमित डाटा कैसे आ जाता है . random?
    4. हर जीव की एक खाद्य श्रंखला है, यानि कोई शक्ति है जिसने पहले जीव बनाया फिर उसके लिए खाद्य पदार्थ बनाये फिर जीव की संख्या को रोकने के लिए उसको भी खाने वाला बनाया.
    5. कैसा भी जीव हो उसको प्रजनन और अपने बच्चो को कैसे पालना है पता होता है, 1 मिनट के भी बच्चे को दूध पीना आता है कैसे ? अपने आप?
    6. मानव शरीर के हर तंत्र के बारे में बहुत कुछ लिखा जा सकता है अतः उसे छोड़ते हैं.
    7. हमने पढ़ा है की पृथ्वी अपने अक्ष पे 23.5 डिग्री झुकी है ,और ये झुका हुआ साइड जब सूर्य की तरफ होता है तब ग्रीष्म ऋतू होती है और जब 6 महीने बाद पृथ्वी घूम के सूर्य की विपरीत दिशा में होती है तो शरद . जाड़े और गर्मी में करीब 40 डिग्री का अंतर होता है (दिल्ली में) जबकी अगर दुरी नापी जाये तो पृथ्वी ग्रीष्म सूर्य के 2Rcos(θ) पास होती है .R=पृथ्वी की त्रिज्या और θ वही 23.5 यानी 11685 KM जो की १५००००००० KM(15 करोड़) के तुलना में कुछ भी नहीं है अगर पृथ्वी के स्थान में 5000 KM की भी त्रुटी हो जाती तो यहाँ जीवन नहीं होता. किसने रखा इतनी accuracy से ? अपने आप?
    8. भारत में साइबेरिया से प्रवासी पक्षी हजारों KM उड़ के हर साल आते हैं, बिना किसी गूगल map या एयर ट्राफिक कण्ट्रोल के. अपने आप?
    हर रचना का रचनाकार होता है,दीवाल पर असंख्य बार रंग की बाल्टी फेकने पर भी एक सुन्दर कलाकृति नहीं बनेगी, रही बात इस तर्क की किसी घटना में मृत्यु होने में भगवान ने क्यों नहीं बचा लिया तो मुझे नहीं लगता मृत्यु इश्वर के लिए कोई बड़ी बात है उसके लिए हर जीवन बराबर है यदि हम प्रतिदिन हने वाले जीवन और मृत्यु को जोड़ दें (यहाँ सिर्फ मानवों की बात नहीं हो रही)तो ये संख्या करोडो में पहुंचेगी. वैसे भी संतान के घर आने पर माता पिता खुश ही होते हैं .
    ये भी तर्क हो सकता है पापियों का नाश तत्काल क्यों नहीं होता तो कर्म का फल मिलता है इस में कोई संशय नहीं होना चाहिए.

    ReplyDelete
  73. धर्म और ईश्वर का निर्माण डर लालच अज्ञानता शोषण आदि कई कारणों से हुआ है
    ज्ञान का बढ़ना खुद बा खुद नास्तिकता या तार्किता की तरफ ले जाता है आस्था सिर्फ तब तक जीवित रहती जब तक अज्ञान से बाहर नही आ पाते
    बिजली गर्जना बाड़ आना भुकम्प आदि सब पहले ईश्वरीय शक्ति का प्रकोप ही समझा जाता था जब तक लोगों को मालूम नही था इनका कारण लेकिन जैसे जैसे दिमागी विकास हुआ पता लगता गया इनका कारण सब प्राकतिक भूगोलीय वजह अब हमारे सामने है धीरे धीरे ईश्वरीय काल्पनिक आस्था का भी मामला सॉल्व हो ही जाना है

    ReplyDelete
  74. Purane jamane main jab kanoon nahi tha tab log pap dharam iswar ka dar dikha kar logon ko dra kar iswar ko manne ko kahte the ager aaj Sab kuch iswar ke bhrose par chode diya jaye to duniya kuch hi dino me khatm ho jayegi kiyoki iswar jasi koi chige is bhammond main hahi hai aaj agar log thoda bahut kuch se drte hai to sirf kanoon se

    ReplyDelete
  75. iswar ko manne walo mujhe afsos hota hai tum par is dharti par jivon ke panpne ka watavarn hone se jeev jantu utpann huye ham bhi sabhi jivon ki tarah hi keval ek jeev hai is dharti par angint jeev jantu ped podhe hai jinhe kisi iswar ne nahi banaya vigyan hi tumare agyan ko dur karega

    ReplyDelete
  76. हमें किसने बनाया?
    यदि इसका उत्तर है "हम खुद ही क्रियेट हुए " है तो हम अपनी मर्जी से क्यों नहीं जीवन गुज़ारते? क्यों हमें मौत आ जाती हैं? तो क्यों कोई इन्सान लंगड़ा / लुला/ काना / मतिमंद / कमजोर / बलवान / गोरा व काला / बद-सुरत व खुबसूरत पैदा हुआ?

    उसी तरह यदि उत्तर है " मॉ ने बनाया " है तो फिर भी यही प्रश्न खड़े होते है, और साथ में यह प्रश्न भी कि, फिर कोई मॉ बांझ क्यों होती ? कोई मॉ लड़के के लिए क्यों तड़प जाती है, जबकि उसे लड़कियां बहुत हैं ?

    यदि कोई इसे साईन्टेफीक रिझ़न कहता है तो साईन्स के तरक्की के पश्चात् इसके द्वारा इसका इलाज क्यों संभव नहीं ?

    इस संसार में कइ जिव आज भी है लेकिन हम उन्हें देख नही पाते, जब निर्मिति को हम देखने ताकत नहीं रख सकते तो क्या निर्माता को देखना संभव है ?

    मनुष्य द्वारा बनाई गई कोई मशीन जैसे फेन,ऐरोप्लँन, इत्यादि को नहीं मालूम के उसका बनाने वाला कौन हैं? कैसा दिखता है? है भी या नहीं? क्योंकि उसके प्रोग्राम में जो चिज़ ऐड होगी बस वह वही तक काम करेंगी।

    और भी बहुत example है ईश्वर के अस्तित्व के...

    ReplyDelete
  77. धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है, विज्ञान के बिना धर्म अंधे है..... अल्बर्ट आइंस्टीन

    ReplyDelete
  78. أَوَلَمۡ يَرَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓاْ أَنَّ ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَٱلۡأَرۡضَ ڪَانَتَا رَتۡقًا فَفَتَقۡنَـٰهُمَا‌ ۖ
    “ हिन्दी अनुवाद ”:-जो लोग काफिर (अल्लाह का इनकार करने वाले ) हो बैठे क्या उन लोगों ने इस बात पर ग़ौर नहीं किया कि आसमान और ज़मीन दोनों एक-दूसरे से मिले (जुड़े ) हुए थे तो हमने दोनों को अलग किया (खोल दिया)… ( सूरह अंबिया - आयात- 30 )

    इस कुरआन के श्लोक से हमें यह बात का पता 1425 सौ साल पहले चला लेकिन साइंस ने इतनी तरक्की और नए-नए आविषकारी साधन बनाने के बाद हमें अभी अभी बताया कि “ बिग-बँग थेरी ( Big bang theory ) ” की वजह से गेलँग्ज़ी (Galaxy ) और पृथ्वी, चंद्र, सूर्य, एवं तारों ( इत्यादी ) का निर्माण हुआ ।

    وَجَعَلۡنَا مِنَ ٱلۡمَآءِ كُلَّ شَىۡءٍ حَىٍّ‌ ۖ أَفَلَا يُؤۡمِنُونَ
    “ हिन्दी अनुवाद ”:- और हम ही ने हर जानदार चीज़ को पानी से पैदा किया इस पर भी ये लोग ईमान न लाएँगे ? ( सूरह अंबिया - आयात- 30 )

    इस कुरआन के श्लोक से हमें यह बात का पता 1425 सौ साल पहले चला लेकिन साइंस ने इतनी तरक्की और नए-नए आविषकारी साधन बनाने के बाद हमें अभी अभी बताया कि “ सायटोप्लाझम ( पेशीद्रव्य ) जो कि कोषा ( cell ) का मूलभूत घटक है, उसमें 80 % पानी होता है। आधुनिक विज्ञान ने यह भी सिध्द किया है कि ज्यादा तर सजीव में 50% से 90% तक पानी पाया जाता है। और प्रत्येक जैविक घटक में जीवन गुजारने के लिए पानी बहुत जरूरी है। ”

    ReplyDelete
  79. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete

किसी धर्म/संप्रदाय विशेष को लक्ष्य करके लिखी गई टिप्पणियाँ हटा दी जाएँगी.